उर्दू मुसलमानों की नहीं हिंदुस्तानियों की भाषा है, झारखंड लिटरेरी मीट में बोले जावेद अख्तर

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उर्दू मुसलमानों की नहीं हिंदुस्तानियों की भाषा है, झारखंड लिटरेरी मीट में बोले जावेद अख्तर

जावेद अख्तर ने कहा कि आज के लेखन में डेप्थ कम हो गया है और सबकुछ जल्दी में लिखा जा रहा है. लिखना तब बेहतर होता है जब आप शब्दों को समझते हैं और उनका सही तरीके से प्रयोग करते हैं.

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उर्दू को आज मुसलमानों की भाषा बताया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि उर्दू उत्तर भारत की भाषा है. इसका असली नाम हिंदवी है. चूंकि जिस समय उर्दू का जन्म हुआ उस वक्त पर्शियन लिपि ही प्रचलित थी और सरकारी कामकाज भी उसी भाषा में होते थे, इसलिए उर्दू को उसी लिपि में लिखा गया. यह खालिस हिंदुस्तानियों की भाषा है. अरब का रहने वाला उर्दू नहीं बोलता, हिंदुस्तानी उर्दू बोलता है. उक्त बातें बाॅलीवुड के मशहूर शायर और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने टाटा स्टील और प्रभात खबर द्वारा आयोजित दो दिवसीय झारखंड लिटरेरी मीट में कही.

कम्युनिकेशन के मायने बदल गये

जावेद अख्तर ने कहा कि आज के समय में कम्युनिकेशन के मायने बदल गये हैं. पहले जिस संदेश को पहुंचने और उसका जवाब आने में 10 दिनों तक का समय लगता था आज उसी मैसेज को पहुंचने में 10 सेकेंड लगता है. इसलिए जरूरी यह है कि हम टेक्नोलाॅजी को स्वीकारें. हमें नयी तकनीकों से झगड़ा नहीं करना है, बल्कि उनका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना है. आज के युवाओं में अगर किताबों को पढ़ने की आदत कम हो गयी है तो इसके लिए हम उन्हें दोष नहीं दे सकते. हमने उन्हें पढ़ना नहीं सिखाया. जो कुछ हमें आज होता हुआ दिखता है, वह सबकुछ हवा में नहीं होता है, बल्कि उसकी बुनियाद पहले ही रख दी जाती है.

लेखन में डेप्थ की कमी हो गयी है

जावेद अख्तर ने कहा कि आज के लेखन में डेप्थ कम हो गया है और सबकुछ जल्दी में लिखा जा रहा है. लिखना तब बेहतर होता है जब आप शब्दों को समझते हैं और उनका सही तरीके से प्रयोग करते हैं. साहित्य दो प्रकार का होता है, एक साहित्य मजमे के लिए लिखा जाता है और दूसरा सीमित लोगों के लिए. इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि पढ़ने वालों का ग्रुप अलग-अलग है.

भाषा किसी धर्म की नहीं होती

भाषा पर जारी विवाद को केंद्र में रखते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि भाषा किसी क्षेत्र की होती है ना कि किसी धर्म और संप्रदाय की. उर्दू को आज मुसलमानों की भाषा बताया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि उर्दू उत्तर भारत की भाषा है. इसका असली नाम हिंदवी है. चूंकि जिस समय उर्दू का जन्म हुआ उस वक्त पर्शियन लिपि ही प्रचलित थी और सरकारी कामकाज भी उसी भाषा में होते थे, इसलिए उर्दू को उसी लिपि में लिखा गया. हिंदी और उर्दू ऐसी भाषा है जो इतनी घुली-मिली है कि उन्हें अलग करने से दोनों भाषा ही खत्म हो जायेगी.

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शोले फिल्म के रोचक तथ्य

इस कार्यक्रम के दौरान जावेद अख्तर ने शोले फिल्म के निर्माण और अपने फिल्म सलेक्शन पर भी बात की. साथ ही जावेद अख्तर ने नये लेखकों को भी लेखन के टिप्स दिये. उन्होंने कहा कि अगर आपको लिखना है तो आपका बहुत पढ़ना भी पड़ेगा. संकोच छोड़कर लिखना होगा, तभी आप एक अच्छे लेखक बन पायेंगे.

आत्मविश्वास से भरपूर रहा जीवन

अपने संघर्ष के दिनों पर पूछे गये सवाल पर उन्होंने कहा कि मुझे ये भरोसा था कि मैं सफल हो जाऊंगा और आज अगर मैं भूखे पेट हूं तो यह मेरी बाॅयोग्राफी में लिखा जायेगा. मैंने हर विपरीत परिस्थिति का ऐसा ही सामना किया. इस मौके पर जावेद अख्तर ने अपनी दो नज्म -ये वक़्त क्या है और ये खेल क्या है सुनाया.

पठन-पाठन की आदत घटी

लिटरेरी मीट की शुरुआत जावेद अख्तर ने कैनवास पर हस्ताक्षर करके किया. इस मौके पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक आशुतोष चतुर्वेदी ने कहा कि आज पठन-पाठन की आदत कम होती जा रही है. खासकर युवा किताबों से दूर होता जा रहा है. ऐेसे में उन्हें किताबों से जोड़ने और उनकी विचारधारा को मजबूत करने के लिए साहित्य उत्सव की बहुत सख्त जरूरत है. झारखंड लिटरेरी मीट ऐसा ही एक आयोजन है, जो युवाओं को पठन-पाठन से जोड़ता है.

साहित्य का सृजन मातृभाषा में हो

इस मौके पर टाटा स्टील के चाणक्य चौधरी ने भी लिटरेरी मीट के महत्व पर प्रकाश डाला. राज्यसभा सांसद और साहित्यकार महुआ माजी ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य का सृजन अपनी मातृभाषा में किया जाना चाहिए. बच्चों के लिए साहित्य लिखा जाना चाहिए ताकि लोगों में पढ़ने की आदत बचपन से हो और ये आजीवन उनकी आदत रहे. इस मौके पर चंद कविताएं के सत्र में अनुज लुगुन, चंद्रमोहन किस्कू, ज्योति लकड़ा और मुंगेश्वर साहू ने अपनी कविताओं का पाठ किया.

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सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना: अनुज लुगुन

इस मौके पर युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि अनुज लुगुन ने कहा कि हालांकि आजकल एक खास मकसद से लिटरेरी मीट का आयोजन किया जा रहा है जहां एक खास तबके के लोगों को ही मंच प्रदान किया जाता है. खासकर इंडीजीनस लोगों को मौका नहीं दिया जाता है. लेकिन झारखंड का लिटरेरी मीट जिसे टाटा स्टील और प्रभात खबर के सौजन्य से आयोजित किया जाता है, वहां ऐसा नहीं है. इससे यह साफ जाहिर होता है कि यहां के लोगों में साहित्य के प्रति प्रेम है. ऐसे आयोजनों से निश्चिततौर पर साहित्य को फायदा होता है. पठन-पाठन का सिलसिला बढ़ता है. सोशल मीडिया के जरिये युवाओं को एक मंच मिला है, जहां वे साहित्य का सृजन कर रहे हैं. तकनीक का प्रयोग किया जाना चाहिए यह एक सशक्त माध्यम है.

मनु भंडारी पर हुई चर्चा

झारखंड लिटरेरी मीट के दूसरे सत्र में मनु भंडारी की याद में चर्चा का आयोजन किया गया. जिसमें साहित्यकार सुधा अरोड़ा, पूनम सक्सेना, रचना यादव और सुजाता ने शिरकत की. साथ ही हजारीबाग के मिहिर वत्स ने अपने उपन्यास टेल्स ऑफ हजारीबाग पर बातचीत की.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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