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वाद्य यंत्रों पर भी शोध किया था सीवी रमण ने

Updated at : 28 Feb 2023 8:42 AM (IST)
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वाद्य यंत्रों पर भी शोध किया था सीवी रमण ने

वर्ष 1926 आते-आते रमण वाद्ययंत्रों की वैज्ञानिक समझ रखनेवाले विश्व के प्रमुख वैज्ञानिक मान लिये गये. यही कारण था कि 1926 में जर्मनी में विज्ञान के विश्वकोष के प्रकाशन की येाजना बनी, तो वाद्ययंत्रों पर वैज्ञानिक आलेख के लिए रमण से आग्रह किया गया.

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चंद्रशेखरम, टिप्पणीकार

महान वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमण के पिता चंद्रशेखर रामनाथन अय्यर फिजिक्स और गणित के शिक्षक थे. वह वायलिन भी बजाते थे. रमण भी कुशल वायलिनवादक थे, लेकिन शौक से मृदंगम बजाते थे. रमण की पत्नी लोकसुंदरी वीणा बजाती थीं. रमण की माता पार्वती संस्कृत की विदुषी थी. संस्कृत, संगीत और वाद्ययंत्रों ने रमण के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला. वर्ष 1909 में जब वह रंगून में अफसर थे, तभी ग्राफ और गणितीय गणना के साथ वाद्ययंत्र इकतारा पर उनका शोधपत्र प्रकाशित हुआ था. रमण को 1911 में कोलकाता पदस्थापित किया गया, जहां उनका संपर्क विज्ञान प्रेमियों से हुआ.

उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने फिजिक्स के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर का प्रस्ताव दिया. वर्ष 1917 में अपेक्षाकृत कम वेतन वाले प्रोफेसर पद को स्वीकार किया. उसी वर्ष वायलिन की ध्वनि पर उनका शोधपत्र विश्व की प्रमुख विज्ञान पत्रिका नेचर में छपा. विभिन्न प्रकार के ढोलकों की ध्वनि पर उनका शोधपत्र 1920 में इसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ. तार वाले वाद्ययंत्रों पर उनका शोध 1921 में प्रकाशित हुआ, जिसमें वीणा और तानपुरा का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया था.

वर्ष 1926 आते-आते रमण वाद्ययंत्रों की वैज्ञानिक समझ रखनेवाले विश्व के प्रमुख वैज्ञानिक मान लिये गये. यही कारण था कि 1926 में जर्मनी में विज्ञान के विश्वकोष के प्रकाशन की योजना बनी, तो वाद्ययंत्रों पर वैज्ञानिक आलेख के लिए रमण से आग्रह किया गया. भारत के लिए गर्व की बात रही कि उस विश्वकोष में लेखन के लिए आमंत्रित होने वाले एकमात्र गैर-यूरोपीय वैज्ञानिक रमण ही थे. साल 1921 के ग्रीष्म में रमण समुद्र मार्ग से इंग्लैंड गये. उस यात्रा में भूमध्य सागर में पानी, प्रकाश, रंग और परावर्तन ने रमण का ध्यान आकर्षित किया. उसी साल समुद्र के रंग पर उनका शोध पत्र नेचर में छपा. प्रकाश के आण्विक विवर्तन पर उनका 56 पृष्ठों का शोधपत्र कोलकाता विश्वविद्यालय ने फरवरी, 1922 में प्रकाशित किया. उसी साल द्रव की पारदर्शिता व समुद्र के रंग विषय पर उनका शोध नेचर में छपा.

28 फरवरी 1928 को रमण ने नया स्पेक्ट्रम देखा और उसी दिन न्यूरेडिएशन की खोज की घोषणा कर दी गयी. वही न्यूरेडिएशन बाद में रमण प्रभाव के नाम से जाना गया. इस खोज के कुछ समय बाद 1928 में ही दो रूसी वैज्ञानिकों ने भी ऐसी ही खोज की थी, जिसे नाम दिया काम्बिनेटरी स्केटरिंग ऑफ लाइट. वर्ष 1930 में जब न्यूरेडिएशन के लिए भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार रमण को दिये जाने की घोषणा हुई, तो रमण ने नोबेल फाउंडेशन से आग्रह किया कि पुरस्कार में रूसी वैज्ञानिकों को भी हिस्सेदार बनाया जाए. रमण के इस आग्रह को स्वीकार करने से मना कर दिया गया. वर्ष 1934 में उन्होंने बेंगलुरु में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस की स्थापना की.

सेवानिवृत्ति के बाद 1948 में रमण ने बेंगलुरु में ही रमण शोध संस्थान की स्थापना की. साल 1960 के बाद रमण मानसिक रूप से अवसाद में आ गये. लेकिन शीघ्र ही उन्होंने स्वयं को संभाला और नये तरीके से जीवन आरंभ किया. उन्होंने बच्चों और फूलों पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे उनके जीवन में प्रसन्नता लौट आयी. वह प्रतिदिन स्कूलों और कॉलेजों के बच्चों को संस्थान में बुलाने लगे. वर्ष 1963 में विभिन्न प्रजाति के फूलों के रंगों के बारे में 12 अध्यायों वाला 75 पृष्ठों का उनका शोध प्रकाशित हुआ. फिर 1964 में तारे, निहारिका और दृष्टि के क्रिया विज्ञान पर शोध प्रकाशित हुआ. वर्ष 1968 में मनुष्य की दृष्टि क्षमता पर शोध प्रकाशित हुआ, जिसमें रात्रिअंधता, धुंधले प्रकाश में दृष्टि क्षमता, रात के समय आकाश आदि विषयों का वैज्ञानिक विश्लेषण है. रमण के जन्मशताब्दी वर्ष 1988 के अवसर पर रमण के सभी शोध पत्रों को प्रकाशित करने की योजना बनी. इस संग्रह को इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस ने छह खंडों में प्रकाशित किया. रमण के लिए शोध के विषय हमेशा बहुआयामी बने रहे, फिर भी कालखंड के अनुसार उनके शोध को वर्गीकृत किया गया है.

वर्ष 1970 में अक्तूबर के अंत में एक दिन वह प्रयोगशाला में ही बेहोश होकर गिर गये. होश आने पर जब कहा गया कि अब वह सामान्य जीवन नहीं जी पायेंगे, तो उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि वह अस्पताल में मरने के बजाय संस्थान की फुलवारी में मरना पसंद करेंगे. उन्होंने 21 नवंबर, 1970 को अंतिम सांस ली. रमण के जीवन की वैज्ञानिक यात्रा ध्वनि विज्ञान से आरंभ हुई थी और ढोलक, मृदंग, प्रकाश, प्रिज्म, पटना के गोलघर, गोलकुंडा के गोल गुंबद, रमण प्रभाव, हीरा, गुलाब और आसमान के सितारों से होती हुई पुनः ध्वनि विज्ञान पर जाकर ही समाप्त हुई.

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