Chandrayaan-3 : चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ही क्यों उतारा गया चंद्रयान को? ये है बड़ी वजह
Published by : Rajeev Kumar Updated At : 23 Aug 2023 6:24 PM
Why Chandrayaan 3 Landed On South Pole of Moon ? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के मून एक्स्प्लोरेशन मिशन चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग के बीच मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर हमारा चंद्रयान दक्षिणी ध्रुव पर ही क्यों उतारा गया है? चंद्र मिशनों के लिए दक्षिणी ध्रुव ही वैज्ञानिकों पसंदीदा क्यों है?
Chandrayaan-3 Landing Successful : भारत के मून एक्स्प्लोरेशन मिशन चंद्रयान-3 ने इतिहास रच डाला है. इसरो ने चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग सफलतापूर्वक पूरी करा दी है. आज शाम अपने तय समय पर, यानी 6:04 बजे इसरो ने लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान से लैस लैंडर मॉड्यूल को चांद पर उतारा. लैंडर विक्रम ने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कर ली. और इसके साथ ही चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग कराने वाला भारत पहला देश बन गया.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (संक्षेप में इसरो) के मून एक्स्प्लोरेशन मिशन चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग के बीच लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर हमारा चंद्रयान दक्षिणी ध्रुव पर ही क्यों उतारा गया है ? चंद्र मिशनों के लिए दक्षिणी ध्रुव ही वैज्ञानिकों पसंदीदा क्यों है ? चंद्रमा के दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों के तापमान में अंतर क्या है?
चंद्रयान-3 दक्षिणी ध्रुव पर ही क्यों उतर रहा है ?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्र मिशन को उतारना पिछले कुछ समय से दुनियाभर के अंतरिक्ष एजेंसियों की दिलचस्पी बना हुआ है. अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा पर इतने गहरे गड्ढे हैं, जहां अरबों वर्षों से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है. इन क्षेत्रों में तापमान आश्चर्यजनक रूप से माइनस 248 डिग्री सेल्सियस ( माइनस 414 फारेनहाइट) तक गिर जाता है. यहां चंद्रमा की सतह को गर्म करने वाला कोई वातावरण नहीं है. चंद्रमा की इस पूरी तरह अज्ञात दुनिया में किसी भी इंसान ने कदम नहीं रखा है. नासा की मानें, तो चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव रहस्य, विज्ञान और उत्सुकता से भरा है.
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की स्पेस रेस खास क्यों है ?
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 14 वर्षों से चंद्रमा का परिक्रमा कर रहे नासा के अंतरिक्ष यान लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर की ओर से इकट्ठा किये गए डेटा से पता चलता है कि स्थायी रूप से छाया वाले कुछ बड़े गड्ढों में वॉटर आइस (पानी की बर्फ) मौजूद है, जो संभावित रूप से जीवन को बनाए रख सकती है. ऐसे में इसमें कोई अाश्चर्य की बात नहीं है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने के लिए एक तरह की स्पेस रेस (अंतरिक्ष होड़) चल रही है.
जापान के साथ एक जॉइंट लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन मिशन योजना
चंद्रयान-3 का विक्रम रोवर चंद्रमा के जिस जगह पर लैंड कर रहा है, वह स्थान भूमध्य रेखा के आसपास उस स्थान से बहुत दूर है, जहां अमेरिकी मिशन अपोलो लैंड हुआ था. इसरो से पहले रूस का चंद्र मिशन लूना-25 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करने वाला था, लेकिन 20 अगस्त को वह चंद्रमा पर हादसे का शिकार हो गया और मिशन फेल हो गया. भारत की 2026 तक चंद्रमा के अंधेरे वाले क्षेत्रों का पता लगाने के लिए जापान के साथ एक जॉइंट लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन (Lupex) मिशन की भी योजना है. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों को खोज के लिए इतना क्यों आकर्षित कर रहा है? वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी बड़ी वजह ‘पानी’ है.
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चंद्र मिशन के लिए दक्षिणी ध्रुव इसलिए है पसंदीदा
अंतरिक्ष विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के रूप में पानी अधिक है, जो एक कीमती संसाधन है. विशेषज्ञों की मानें, तो चंद्रमा के ध्रुव बहुत समान हैं. दोनों में ऊंचे भू-भाग और ऊबड़-खाबड़ जगहें हैं, जिनमें बड़े क्षतिग्रस्त क्रेटर और छोटे ताजे क्रेटर हैं. क्रेटर उन गड्ढों को कहा जाता है जो विस्फोट या ज्वालामुखी के फटने के कारण बनते हैं. ध्रुवों के बीच का अंतर बहुत छोटा है. चंद्र ध्रुवों पर ऐसे स्थान हैं जिन पर सदैव धूप रहती है. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव तुलनात्मक रूप से कम ठंडा है. इस इलाके में अंधेरा भी कम रहता है.
सूर्य की रोशनी चंद्रमा मिशन के लिए वरदान
उदाहरण के लिए शेकलटन क्रेटर के पास क्षेत्र में लंबे समय तक सूर्य का प्रकाश रहता है. हमारे गृह पृथ्वी के हिसाब से यहां 200 से अधिक दिनों तक चमक बरकार रहती है. लगातार सूर्य की रोशनी चंद्रमा मिशनों के लिए एक वरदान की तरह होती है. इस सूर्य की रोशनी से खोजकर्ताओं को चंद्रमा की सतह को रोशन करने और उसके उपकरणों को ऊर्जा देने में मदद मिलती है. चंद्रयान-3 का लैंडर भी सूरज की रोशनी से ही ऊर्जा लेकर काम करेगा. साथ ही, चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव रोशनी की उपलब्धता, संचार और नेविगेट करने में आसान टोपोग्राफी सहित कई तकनीकी कारणों से लैंडिंग के अनुकूल माना जाता है.
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