पर्वतारोहण के लिए नहीं मिल रहा कोई प्रायोजक
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :08 May 2017 5:21 AM
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जलपाईगुड़ी : फुटबॉल, क्रिकेट जैसे खेलों की तरह पर्वतारोहण को कोई प्रायोजक नहीं मिल रहा है. हिमाचल प्रदेश के 6001 मीटर ऊंचे माउंट देव टिब्बा पर चढ़ाई अभियान के लिए तीन लाख रुपये की जरूरत है. लेकिन इन रुपयों के जुगाड़ के लिए जलपाईगुड़ी नेचर एंड ट्रेकर्स क्लब को जूते घिसने पड़ रहे हैं. यह […]
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जलपाईगुड़ी : फुटबॉल, क्रिकेट जैसे खेलों की तरह पर्वतारोहण को कोई प्रायोजक नहीं मिल रहा है. हिमाचल प्रदेश के 6001 मीटर ऊंचे माउंट देव टिब्बा पर चढ़ाई अभियान के लिए तीन लाख रुपये की जरूरत है.
लेकिन इन रुपयों के जुगाड़ के लिए जलपाईगुड़ी नेचर एंड ट्रेकर्स क्लब को जूते घिसने पड़ रहे हैं. यह क्लब पांच साल बाद उत्तर बंगाल से बाहर निकल कर रोमांचक पर्वतारोहण अभियान को पूरा करना चाहता है. इसके लिए उसे रुपयों की जरूरत है. जगह-जगह सहायता के लिए अनुरोध किया गया, लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली. आखिरकार क्लब के पर्वतारोहियों ने अपने खर्च से हिमाचल प्रदेश में आरोहण अभियान का निर्णय लिया.
जलपाईगुड़ी नेचर एंड ट्रेकर्स क्लब के पर्वतारोही आगामी सात जून को जलपाईगुड़ी से निकलेंगे और 27 जून को अभियान पूरा कर लौटेंगे. क्लब के सचिव भाष्कर दास ने बताया कि फुटबॉल क्रिकेट की बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए प्रायोजक मिल जाते हैं, लेकिन पर्वतारोहण जैसे रोमांचक खेल के लिए काफी प्रयास करने के बावजूद एक रुपये की व्यवस्था नहीं हो पायी है. हालांकि जिला प्रशासन और कई निजी संस्थाओं से सहायता के लिए हम संपर्क बनाये हुए हैं.
आठ सदस्यीय पर्वतारोहण अभियान दल में दो महिलाएं, एक शिक्षक और कोलकाता पुलिस के एक अधिकारी शामिल हैं. अभियान का नेतृत्व भाष्कर दास करेंगे. पर्वत शिखर की ऊंचाई कम होने के बावजूद तकनीकी रूप से यह काफी चुनौतीपूर्ण है. अभियान दल की सदस्य तथा जलपाईगुड़ी के सेंट जेवियर्स कॉलेज की शिक्षिका विशाखा शर्मा ने बताया कि छह हजार मीटर ऊंचे इस पर्वत की चढ़ाई के दौरान करीब एक हजार मीटर की चढ़ाई रोपलाइन लगाकर करनी होगी. रास्ते में कई जगहों पर बर्फीली खाइयों और हिम-स्खलन का भी खतरा है.
भाष्कर दास ने बताया कि अभी तक माउंट देव टिब्बा पर चढ़ाई के लिए जितने अभियान हुए हैं, उनमें से लगभग आधे विफल रहे हैं. इस पर्वत शिखर को पहली बार सन 1952 में फतह किया गया था. इसके बावजूद अभी भी इसके बारे में बहुत कुछ अनजाना है. यह पर्वत शिखर हिमाचल की पीरपांजाल पर्वत शृंखला का हिस्सा है. भाष्कर दास ने बताया कि उनका अभियान पर्वतीय इलाके की साफ-सफाई भी करेगा.
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