घोड़ागाड़ी पर सवार होकर पहुंच रहे मां जहुरा के भक्त

Updated at :03 May 2017 8:55 AM
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घोड़ागाड़ी पर सवार होकर पहुंच रहे मां जहुरा के भक्त

हाइटेक युग में भी जारी है यह अनोखी परंपरा विश्वास है कि घोड़ागाड़ी पर आने से पूरी होती मन्नत मालदा. वैशाख महीने में होनेवाली जहुरातला कालीपूजा में आज के हाइटेक युग में भी लोग घोड़ागाड़ी पर सवार होकर पूजा करने पहुंचते हैं. भक्तों का विश्वास है कि घोड़ागाड़ी पर सवार होकर मंदिर तक आने से […]

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हाइटेक युग में भी जारी है यह अनोखी परंपरा
विश्वास है कि घोड़ागाड़ी पर आने से पूरी होती मन्नत
मालदा. वैशाख महीने में होनेवाली जहुरातला कालीपूजा में आज के हाइटेक युग में भी लोग घोड़ागाड़ी पर सवार होकर पूजा करने पहुंचते हैं. भक्तों का विश्वास है कि घोड़ागाड़ी पर सवार होकर मंदिर तक आने से मनोकामना पूरी होती है. लेकिन जहुराकाली मां का घोड़ागाड़ी से क्या संबंध है, यह एक रहस्य ही है.
जहुराकाली मंदिर मालदा शहर से करीब सात किलोमीटर दूर इंगलिशबाजार ब्लॉक के जदुपुर-2 ग्राम पंचायत इलाके में है. यह इलाका भारत-बांग्लादेश की सीमा से लगा हुआ है. सिद्ध-साधकों का दर्शन पाने के लिए बड़ी संख्या में भक्त वैशाख महीने में जहुराकाली मंदिर पहुंचते हैं. पूरे महीने पूजा एवं मेला चलता है.
मंदिर के प्रधान सेवायत मुकुल तिवारी ने कहा कि यह मंदिर करीब साढ़े तीन सौ साल पुराना है.वैशाख महीना तो खास है ही, बाकी समय में भी हर मंगल और शनिवार को बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं. बताया जाता है कि मंदिर के पुजारी परिवार के पुरखे पैदल चलकर उत्तर प्रदेश से मालदा पहुंचे थे. बांग्ला कैलेंडर के हिसाब से वह सन 1416 का वैशाख महीना था. उन्होंने ही जहुरा मां की पूजा शुरू की थी.
आज जहुरा मां दुर्गा और काली रूप में पूजी जाती हैं. मालदा शहर के नेताजी सुभाष रोड के मूर्तिकार जतीन पाल मां का मुखौटा तैयार करते हैं. इस मुखौटे को लेकर मंदिर आना होता है. जहुरा मां को बतासा, संदेश और जवा फूल चढ़ाया जाता है. शहर से मंदिर तक खूबसूरत रास्ता लोग घोड़ागाड़ी पर तय करते हैं. लोग घोड़ागाड़ी से ही क्यों आते हैं, इस बारे में कोई कुछ खास नहीं बता पाता.
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