कई कारखाने बंद हुए,मजदूरों की गयी नौकरी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 06 Jan 2017 9:11 AM
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मालदा. रेशम उद्योग का बुरा हाल, बनारस व तमिलनाडु से खरीदारों का आना हुआ बंद दो महीने में रेशम सूत के दाम में प्रति किलो 1 हजार की कमी मालदा : नोटबंदी की मार से मालदा जिले में रेशम उद्योग का बुरा हाल है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब आठ नवंबर को हजार तथा पांच […]
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मालदा. रेशम उद्योग का बुरा हाल, बनारस व तमिलनाडु से खरीदारों का आना हुआ बंद
दो महीने में रेशम सूत के दाम में प्रति किलो 1 हजार की कमी
मालदा : नोटबंदी की मार से मालदा जिले में रेशम उद्योग का बुरा हाल है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब आठ नवंबर को हजार तथा पांच सौ रुपये के नोट रद्द करने की घोषणा की थी तो 50 दिनों बाद सब कुछ सामान्य होने का दावा किया था. रेशम उद्योग पर सामान्य होने जैसा कुछ नहीं दिख रहा है. आठ नवंबर के बाद से रेशम सूते के दाम में लगातार कमी आ रही है. रेशम सूत खरीदने के लिए कोई बाहरी व्यापारी यहां नहीं आ रहे हैं. नोटबंदी से पहले अक्टूबर महीने तक रेशम सूते की कीमत 32 सौ से 35 सौ रुपये किलो थी.
नोटबंदी की घोषणा के बाद से दाम लगातार गिर रहे हैं. वर्तमान में रेशम सूते की कीमत 25 सौ से 26 सौ रुपये प्रति किलो रह गया है. उसके बाद भी खरीददार मिलना मुश्किल हो रहा है.
रेशम किसानों का कहना है कि मालदा जिले में रेशम उद्योग की अपनी एक अलग महत्ता है. इस जिले की अर्थव्यवस्था रेशम से उद्योग पर भी निर्भर करती है. पश्चिम बंगाल में 80 प्रतिशत रेशम का उत्पादन इसी जिले में होता है. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से 68 हजार परिवार रेशम उद्योग से जुड़े हुए हैं. कालियाचक-1 ब्लॉक के अलीपुरद्वार-2 ग्राम पंचायत के शेरशाही गांव के रहने वाले एक रेशम किसान सलाउद्दीन मोमिन ने बताया है कि वह 20 साल से रेशम की खेती कर रहे हैं. घर में रेशम का कारखाना भी है. हर दिन पांच किलो रेशम सूत का उत्पादन वह अपने घर में ही कर लेते हैं. मजदूरों को 300 रुपये प्रति किलो की दर से मजदूरी देनी पड़ती है. वर्तमान में 12 श्रमिक उनके कारखाने में काम कर रहे हैं. नोटबंदी के बाद रेशम सूत की बिक्री बंद है. जितने सूत का उत्पादन हुआ, वह पड़ा हुआ है. खरीददार मिलना मुश्किल है. परिणामस्वरूप कई श्रमिकों को काम से हटाना पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि मुख्य रूप से नवंबर से लेकर फरवरी तक रेशम सूत का उत्पादन होता है. उनके परिवार में आठ सदस्य हैं. परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा, इसको लेकर चिंता हो रही है. कुछ इसी प्रकार हाल एक और रेशम कारोबारी जुल्फीकार शेख का भी है. उनके परिवार में 12 सदस्य हैं. पूरा परिवार रेशम कारोबार पर ही निर्भर है.
जुल्फीकार ने बताया है कि नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही कारोबार मंदा हो गया है. उनके घर में भी रेशम बनाने का कारखाना है. यह कारखाना अभी बंद है. पैसा नहीं मिलने की वजह से यहां काम करने वाले श्रमिक काम छोड़कर चले गये हैं. जुल्फीकार का कहना है कि जब रेशम की बिक्री ही नहीं होगी, तो वह भला अपने श्रमिकों को कहां पैसे दे सकेंगे. इसी वजह से श्रमिक काम छोड़कर चले गये हैं.
कालियाचक इलाके में हजारों परिवार ऐसे हैं जिनका पालन-पोषण रेशम से उद्योग से हो रहा है. इधर, मालदा जिला रेशम विभाग सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जिले में करीब 21 हजार एकड़ जमीन पर रेशम की कीड़े पाले जाते हैं. करीब 16 सौ मीट्रिक टन रेशम का उत्पादन सिर्फ इस जिले में होता है. साल में करीब एक हजार करोड़ रुपये का काम जिले के रेशम उद्योग में होता है. साल में चार बार रेशम किसान रेशम का सूता बनाते हैं. अगस्त, नवंबर, फरवरी और मार्च महीने में बड़े पैमाने पर रेशम सूता बनाये जाते हैं. कालियाचक-1, 2 तथा 3 ब्लॉक में सबसे अधिक रेशम की खेती होती है. एक तरह से कहें तो जिले में 90 प्रतिशत रेशम का उत्पादन इन्हीं तीनों ब्लॉक में होता है. 10 प्रतिशत रेशम अन्यत्र तैयार किये जाते हैं.
इतना ही नहीं, इन्हीं तीनों ब्लॉक में रेशम सूता बनाने के अधिकांश कारखाने भी हैं. स्थानीय भाषा में रेशम कारखाने को घाई कहा जाता है. नोटबंदी के इस दौर में जिले के अधिकांश घाई की हालत खराब है. कालियाचक के एक सूता व्यवसायी मुजफ्फर अली ने बताया है कि वह पिछले 30 साल से रेशम सूता का कारोबार कर रहे हैं. इस प्रकार की संकट उन्होंने कभी नहीं देखी. मालदा से रेशम सूता को मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बनारस स्थित मुबारकपुर तथा तमिलनाडू के कोपाकेनाम इलाके में भेजा जाता है. इसके अलावा पश्चिम बंगाल में बीरभूम तथा बांकुड़ा में भी मालदा का रेशम भेजा जाता है. अब आलम यह है कि इन तमाम स्थानों से काफी कम संख्या में खरीददार रेशम सूता लेने आ रहे हैं. इस तरह की विकट परिस्थिति नोटबंदी की वजह से हुई है.
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