1977 में माकपा ने पहली बार कांग्रेस से छीनी थी चोपड़ा सीट

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सिलीगुड़ी. उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा विधानसभा क्षेत्र में इस बार तृणमूल कांग्रेस की मुख्य लड़ाई माकपा से होनी है. तृणमूल को कमजोर करने के लिए गोरखा जनमुक्ति मोरचा ने भी अपना उम्मीदवार यहां से खड़ा किया है. कांग्रेस की ओर से अभी तक यहां के लिए उम्मीदवार के नाम के घोषणा नहीं की गयी […]

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सिलीगुड़ी. उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा विधानसभा क्षेत्र में इस बार तृणमूल कांग्रेस की मुख्य लड़ाई माकपा से होनी है. तृणमूल को कमजोर करने के लिए गोरखा जनमुक्ति मोरचा ने भी अपना उम्मीदवार यहां से खड़ा किया है. कांग्रेस की ओर से अभी तक यहां के लिए उम्मीदवार के नाम के घोषणा नहीं की गयी है.

उम्मीद है कि कांग्रेस यहां माकपा का समर्थन करेगी. एक जमाने में चोपड़ा कांग्रेस का गढ़ था. इस मुसलिम बहुल इलाके में समस्याओं की कोई कमी नहीं है. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार विकास के नाम पर वोट पड़ता है या फिर सांप्रदायिक पहचान ही हावी रहती है. चोपड़ा इलाके में सबसे अधिक दुर्गति शिक्षा की है.

इसके अतिरिक्त पेयजल, बिजली, सड़क आदि की समस्या तो है ही. इस विधानसभा इलाके में एक भी कॉलेज या उच्च विद्यालय नहीं है. माध्यमिक तक पढ़ाई करने के बाद यहां के शिक्षार्थियों को इस्लामपुर जाना पड़ता है. पिछले किसी भी विधायक ने शिक्षा व्यवस्था के लिए कोई खास कार्य नहीं किया है. इस बार चोपड़ा क्षेत्र के युवा आक्रोशित नजर आ रहे हैं. नेताओं द्वारा शिक्षा की उपेक्षा से वे नाराज हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि इलाके में पेयजल की भी काफी समस्या है. शत-प्रतिशत बिजली पहुंचाने का दावा करनेवाली तृणमूल सरकार के राज में यहां के कई गांवों में बिजली है ही नहीं. कई जगह पोल व तार पहुंच गया है, पर बिजली नहीं आती. सड़कें भी बदहाल हैं. यातायात के लिए अभी भी कच्ची सड़कों का इस्तेमाल किया जा रहा है. बारिश में कीचड़ और गर्मी में धूल से सड़कों पर चलना दुश्वार हो जाता है.तृणमूल की ओर से चुनाव की घोषणा होने के साथ ही उम्मीदवार घोषित किया जा चुका है. लेकिन इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गयी है. भाजपा की यहां कोई पूछ नहीं है. यहां कांग्रेस व माकपा में टक्कर होती रही है.

1957 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मुहम्मद अफाक चौधरी यहां से पहले विधायक बने. वह 1957 से 1968 तक यहां के विधायक रहे. 1969 के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस के ही अब्दुल करीम चौधरी यहां से विधायक बने. वह लगातार 1977 तक विधायक रहे. 1977 के विधानसभा चुनाव में माकपा के मुहम्मद बच्चा मुंशी ने विधायक की कुर्सी हासिल की.

इस चुनाव में अब्दुल करीम चौधरी कांग्रेस से बागी होकर दूसरी जगह इस्लामपुर से निर्दलीय के रूप में चुनाव में उतरे एवं जीत हासिल की. मुहम्मद बच्चा मुंशी माकपा से लगातार दो बार बिधायक बने. 1987 के विधानसभा चुनाव में माकपा के मुहम्मदीन यहां से विजयी हुए और लगातार 2001 तक विधायक बने रहे. वर्ष 2011 में कांग्रेस के बागी नेता हमीदुल रहमान निर्दलीय विधायक बने. इसके बाद 2006 के विधानसभा चुनाव में माकपा के अनारूल हक विजयी हुए. लेकिन वर्ष 2011 के चुनाव में हमादुल रहमान ने फिर इस सीट पर अपना कब्जा जमा लिया. गौरतलब है कि कांग्रेस से बागी होकर निर्दलीय चुनाव में उतरने के बाद भी रायगंज की कांग्रेस सांसद दीपा दास मुंशी ने हमीदुल रहमान के समर्थन में चुनाव प्रचार किया था. पिछले विधानसभा चुनाव में हमीदुल रहमान निर्दलीय निर्वाचित हुए थे, लेकिन बाद में वह तृणमूल में शामिल हो गये. उल्लेखनीय है कि राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कुल 18 बागी नेता चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन जीत सिर्फ हमीदुल रहमान को ही मिली थी.

इस बार हमीदुल रहमान पर भरोसा जताते हुए तृणमूल ने उन्हें मैदान में उतारा है. दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली इस विधानसभा सीट पर तृणमूल को टक्कर देने के लिए माकपा ने एकरामुल हक को और गोरखा जनमुक्ती मोरचा ने हाजी नासेर अहमद खान को उम्मीदवार बनाया है. मजे की बात यह है कि दार्जिलिंग जिले के पहाड़ के तीनों विधानसभा क्षेत्रों दार्जिलिंग, कर्सियांग व कालिम्पोंग में जहां माकपा ने मोरचा को खुला समर्थन दिया है, वहीं चोपड़ा में दोनों एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं.
वर्ष 2011 का चुनाव परिणाम
हमीदुल रहमान (निर्दलीय) – 64 हजार 289 वोट – कुल मतदान का 44.62%
अनारूल हक (माकपा) – 57 हजार 719 वोट – कुल मतदान का 40.06%
शेख जलालुद्दीन (टीएमसी) – 6 हजार 944 वोट – कुल मतदान का 4.82%
असीम चंद्र वर्मन (भाजपा) – 5 हजार 793 वोट – कुल मतदान का 3.48%
रोहीदास उरांव (निर्दलीय) – 5 हजार 377 वोट
साफिया खातून (निर्दलीय) – 2 हजार 178 वोट
जयदेव विश्वास (बीएसपी) – 178 वोट
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