सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा ने कहा, देर से मिला न्याय भी एक अन्याय है

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सिलीगुड़ी. बार एसोसिएशन व बेंच एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. बार जितना मजबूत होगा न्याय व्यवस्था उतनी ही सुदृढ़ होगी. बार और बेंच देश के नागरिकों के साथ न्याय करने का काम जरूर करते हैं लेकिन न्याय करने वाले ना ही भगवान हैं और ना ही स्वर्ग से पधारे हैं.भारत देश की गणतांत्रिक […]

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सिलीगुड़ी. बार एसोसिएशन व बेंच एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. बार जितना मजबूत होगा न्याय व्यवस्था उतनी ही सुदृढ़ होगी. बार और बेंच देश के नागरिकों के साथ न्याय करने का काम जरूर करते हैं लेकिन न्याय करने वाले ना ही भगवान हैं और ना ही स्वर्ग से पधारे हैं.भारत देश की गणतांत्रिक व्यवस्था विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीन स्तंभ पर खड़ी है और न्यायपालिका के दो पहलू हैं बार और बेंच़ ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.

बार का काम है कि न्यायाधीश के समक्ष सच और झूठ को साबित करना ताकि न्यायाधीश सही फैसले ले सकें. न्यायाधीश का फैसला ही अंतिम माना जाता है़ इसीलिये न्यायाधीश का निष्पक्ष रहना बेहद जरूरी है.यह बातें सुप्रीम कोर्ट के जज अरूण कुमार मिश्रा ने कही़ वह यहां पश्चिम बंगाल बार काउंसिल व बार काउंसिल ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे़ उन्होंने कहा कि देर से मिला न्याय भी एक अन्याय है़.

दीनबंधु मंच में शुरू हुए सम्मेलन के पहले दिन सुुप्रीम कोर्ट के जज अरूण कुमार मिश्रा के अलावा कलकत्ता हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश डा. मंजुला चेल्लुर, कोलकाता हाइकोर्ट के जज जयमाल्य बागची, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष एसए. देशमुख, पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के चेयरमैन असित बर्मन बसु व राज्य विधनसभा के अध्यक्ष बिमान बनर्जी सहित अन्य गणमान्य लोगों ने संबोधित किया. सम्मेलन का शुभारंभ सिलीगुड़ी बार काउंसिल के सदस्यों ने सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा गीत गाकर किया.

अपने भाषण में जज जयमाल्य बागची ने कहा कि लोगों को हमारी जरूरत है हमें उनकी सहायता करनी चाहिये. न्यायमूर्ति भगवान के दूत के रूप में न्याय करने का काम करते हैं. प्राचीन काल में न्याय करने वाले को भगवान का रूप माना जाता था़ अगर भारत की न्यायपालिका अपना दायित्व का पालन ठीक से नहीं करेगी तो वह दिन दूर नही जब देश में खाप पंचायतों का राज होगा. बार और बेंच को एक टीम की तरह कार्य करना चाहिये. न्याय करने की शक्ति संविधान से के अलावा खुद से भी आनी चाहिये. वहीं बिमान बनर्जी ने बार और बेंच के रिश्तों की व्याख्या करते हुए बताया कि बार और बेंच एक ही शरीर के दो अंग हैं. एक अंग के खराब होने पर दूसरा अंग ठीक तरह से कार्य नहीं कर सकता. देश की सभी अदालतों में काफी मामले लंबित है उन सब मामलों का निराकरण जल्द होना चाहिये, क्योंकि देरी से मिला न्याय भी एक अन्याय है. उन्होने कहा कि भारत की न्यायपालिका आज भी ठीक तरह से काम कर पाने अक्षम है.
कलकत्ता हाइकोर्ट की मुख्य न्यायाधीस डॉ मंजुला चेल्लुर ने कहा कि बार और बेंच एक ही सिक्के के दो पहलू हैं एवं न्यायपालिका भारतीय गणतंत्र का तीसरा स्तंभ है. तीसरे स्तंभ के दोनों पहलू स्वर्ग से नहीं पधारे हैं. रामायण के एक छंद को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते हुए डॉ चेल्लुर ने बताया कि जब रावण लंका के अशोक वाटिका को उजाड़ने वाले हनुमान को मारने की बात करता है तो उस समय विभीषण न्यायपालिका के स्थान पर विराजमान होकर अपने भाई को ऐसा करने से रोकते है़ं बार के सदस्यों को भी विभीषण की तरह ही कार्य करना चाहिये. उन्होने कहा कि विभिन्न बार एसोसिएशनों के बीच-बीच में हड़ताल पर जाना एक अच्छी बात नहीं है और यह अशोभनीय भी है.

नागरिक अपनी समस्यों को लेकर हमारे पास आते हैं,लेकिन हम ही समस्या खड़ी करें तो क्या होगा? डा. चेल्लुर ने देश के समस्त बार सदस्यों को बेंच और बार के संबधों पर सोचने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि भारत के न्यायपालिका को इस तरह काम करना चाहिये कि देश का कोई भी अंगुली ना उठा सके़.

न्यायाधीश अरूण कुमार मिश्रा ने अपने भाषण में डा. चेल्लुर की बातों को सही ठहराया और कहा कि बार के सदस्य न्यायाधीशों की रक्षा कवच भी हैं. बार की मजबूती पर ही न्यायपालिका की मजबूती टिकी हुई है. आंखों के सामने जब कुछ नजर नहीं आता तो सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है, जिस पर हमें विश्वास है. इसी वजह से काले रंग का कोट हमें पहनने को दिये जाते हैं. नागरिकों को इस काले कोट पर विश्वास है कि यह रंग न्याय करेगा. भारतीय गणतंत्र में नागरिकों को न्याय व्यवस्था पर विश्वास है. लेकिन भारत में न्याय पाने में तीस से पैंतीस वर्ष भी बीत जाते है़ं किसी-किसी मामले में तो याचिका करने वालों की मौत तक हो जाती है. देर से मिला न्याय भी एक अन्याय है. ऐसी न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा कि क्या इसी के लिये न्यायपालिका को बनाया गया? न्यायाधीश को निष्पक्ष होने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा हो सकता है कि कटघरे में खड़ा व्यक्ति न्यायाधीश का खास हो, अपना हो लेकिन न्यायाधीश की कुरसी पर बैठे व्यक्ति को जाति-धर्म, राजनीति से ऊपर उठकर न्याय करना होता है.
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