दो दिवसीय हिंदी दिवस समारोह संपन्न

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सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी महाविद्यालय के छात्र संसद एवं हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में प्रयोजित दो दिवसीय हिंदी दिवस समारोह के दूसरे दिन सरकार के भाषाई सरोकार हिंदी और हिंदी वाले विषय पर संगोष्ठी के आयोजन के साथ ही संपन्न हो गया.इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो उज्जवल चंद्र सरकार ने की. मुख्य अतिथि के रूप में […]

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सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी महाविद्यालय के छात्र संसद एवं हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में प्रयोजित दो दिवसीय हिंदी दिवस समारोह के दूसरे दिन सरकार के भाषाई सरोकार हिंदी और हिंदी वाले विषय पर संगोष्ठी के आयोजन के साथ ही संपन्न हो गया.इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो उज्जवल चंद्र सरकार ने की. मुख्य अतिथि के रूप में प्राईमरी स्कूल काउंसिल के चेयरमैन प्रो मुकुल कांति घोष उपस्थित थे.उन्होंने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान सरकार अपने शैशव काल से ही हिंदी भाषा के प्रति बहुप्रतीक्षित भाषाई सरोकार के तहत सक्रि य है.

प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा की दिशा में हिंदी विद्यालय, महाविद्यालय की स्थापना हिंदी भाषियों के लिए ऐतिहासिक उपलिब्ध है. जरूरत है कि सरकार की इस सक्रि यता के प्रति हिंदी वाले आश्वस्त होकर अपनी सिक्रयता को बढ़ाएं.संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सिलीगुड़ी महाविद्यालय के गवर्निंग बॉडी के सदस्य श्री जयंत कर ने कहा कि वह स्वयं हिंदी भाषा की सहजता के कायल हैं.


उन्होंने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल की सरकार विद्यालयों को पर्याप्त मूलभूत संसाधन उपलब्ध करा रही है. इसी कड़ी के तहत सलीगुड़ी में हिंदी विद्यालय में विज्ञान विषय के पठन-पाठन की व्यवस्था की गयी है. साथ ही यह भी कहा कि सिलीगुड़ी में हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद के नाम पर महाविद्यालय की स्थापना हुई. इस मौके पर नक्सलबाड़ी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ समरेन्द्र सरकार ने कहा कि उत्तर बंगाल के कई महाविद्यालयों में हिंदी माध्यम से पठन-पाठन की व्यवस्था की गयी है. साहित्यकार डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि सरकार के भाषाई सरोकार को केंद्र और राज्य दो संदर्भ में समझने की जरूरत है. केंद्र सरकार के भाषाई सरोकार के तहत राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रति सकारात्मक पहलू से ही राष्ट्र भाषा की उपलिब्ध हो सकती है.सिलीगुड़ी कॉलेज के हिंदी विभाग के अध्यक्ष अजय साव ने कहा कि आज भाषा का विकास एक भावुक संदर्भ नहीं रह गया है. आज़ादी पूर्व और वर्तमान भाषाई सरोकार में पर्याप्त अंतर यह है कि तब भाषा का राष्ट्रीय संदर्भ मुख्य था, पर आज हिंदी का भविष्य उसका विकास सरकार की मंशा पर भी कुछ हद तक निर्भर है. सरकार की व्यवस्थागत नीति पर ही हिंदी भाषा में विकास के अपेक्षति अवसर निहित हैं.
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