अब विदेशों में भी होगा आयुर्वेद का विस्तार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 Sep 2018 4:06 AM (IST)
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कोलकाता : आयुष की परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. यही कारण है कि केंद्र सरकार के गठन के छह महीने के भीतर इसका अलग मंत्रालय बनाया गया. आयुर्वेद को लेकर देश में मौजूदा सिस्टम प्रभावी नहीं था. मोदी सरकार ने आयुर्वेद के क्षेत्र में भी अामूल चूल प्रतिवर्तन किये. प्रधानमंत्री का विजन आज सही […]
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कोलकाता : आयुष की परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. यही कारण है कि केंद्र सरकार के गठन के छह महीने के भीतर इसका अलग मंत्रालय बनाया गया. आयुर्वेद को लेकर देश में मौजूदा सिस्टम प्रभावी नहीं था. मोदी सरकार ने आयुर्वेद के क्षेत्र में भी अामूल चूल प्रतिवर्तन किये. प्रधानमंत्री का विजन आज सही मायने में उतरने लगा है. मंत्रालय बनने के एक ही साल में योग दुनियाभर में छा गया. विश्व योग दिवस के बाद दो सौ राष्ट्र अब योग को मानने लगे हैं.
योग एक शक्ति है और आयुर्वेद के जरिए दुनिया को बहुत कुछ दिया जा सकता है. योग की तरह ही आयुर्वेद को भी पूरी दुनिया में लेकर जाएंगे. देश में सब आयुर्वेद को जानते हैं, लेकिन इसके लिए लोगों की मानसिकता बदलनी होगी. वहीं आयुष चिकित्सा पद्धति को दुनियाभर में पहुंचाने के लिए मंत्रालय अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मिल कर कार्य करेगा.
इस योजना के तहत विशेष विश्व स्तर पर विशेष कर आयुर्वेद के पंचकर्मा और यूनानी का विस्तार किया जायेगा. इसके लिए हाम में ही जयपुर में एक बैठ हुई. इस बैठक में डब्ल्यूएचओ तथा केंद्रीय आयुष मंत्रालय के आला अधिकारी उपस्थित थे. लगभग 5 हजार वर्ष पुरानी चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का विस्तार विदेशों में किये जाने लिए एक रोड मैप भी तैयार किया गया है. इसके लिए डब्ल्यूएचओ व मंत्रालय के बीच एक करार पर हस्ताक्षर हुआ है. इस विषय में नेशनल आयुर्वेद स्टूडेंट्स एंड यूथ मिशन (नस्या) के राष्ट्रीय अध्यक्ष छगन जंगीद ने बताया कि आयुर्वेद में कई असाध्य बीमारियों का इलाज संभव है, जो शायद एलोपैथी के लिए लाइलाज बीमारी है.
भारत के अलावा जर्मनी, जापान में भी आयुर्वेद की प्रैक्टिस की जाती है. लेकिन इसके बाद भी हमारे उपर आरोप लगता है कि हम आयुर्वेद के पास विभिन्न बीमारियों कि चिकित्सा के लिए स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल नहीं है. क्योंकि इस दौर में हर व्यक्ति एलोपैथी के चश्मे से देखते हैं. ऐसे में डब्ल्यूएचओ के साथ कार्य करने से आयुर्वेद का विस्तार ना केवल विदेशों में होगा, बल्कि हम डब्ल्यूएचओ के गाइड लाइन का अनुसरण कर सकेंगे. विभिन्न बीमारियों के इलाज लिए हमारे पास भी एक प्रोटोकॉल होगा. इससे आयुर्वेद की पढ़ाई करनेवाले स्टूडेंट्स भी लाभान्वित होंगे.
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