बाड़ से छींटसाकाती गांव का अस्तित्व खतरे में
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :08 Dec 2017 10:52 AM (IST)
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जलपाईगुड़ी: भारत और बांग्लादेश के एन्क्लेव (छींटमहल) इलाकों की अदला-बदली हो जाने के बावजूद अभी भी कई सीमावर्ती गांव पूर्व की हालत में ही जी रहे हैं. इन्हीं गांवों में शामिल है छींटसाकाती गांव. इस गांव की कुल आबादी 170 है, जबकि यहां जमीन का परिमाण 153 बीघा है. हाल ही में दोनों देशों की […]
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जलपाईगुड़ी: भारत और बांग्लादेश के एन्क्लेव (छींटमहल) इलाकों की अदला-बदली हो जाने के बावजूद अभी भी कई सीमावर्ती गांव पूर्व की हालत में ही जी रहे हैं. इन्हीं गांवों में शामिल है छींटसाकाती गांव. इस गांव की कुल आबादी 170 है, जबकि यहां जमीन का परिमाण 153 बीघा है. हाल ही में दोनों देशों की संयुक्त टीम ने इस इलाके का सर्वे किया है. अनुमान किया जाता है कि सर्वे पूरा होने के बाद यहां की सीमा पर कांटेदार बाड़ लगायी जायेगी. साकाती गांव के निवासियों को आशंका है कि यदि कांटेदार बाड़ लगी, तो उनका गांव भारत और बांग्लादेश दोनों से कट जायेगा.
गांव की 60 बीघा जमीन बाड़ के उस पार रह जायेगी. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, बाड़ लग जाने से स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के लिए उनकी परेशानी बढ़ जायेगी. फिलहाल इन सेवाओं के लिए छींटसाकाती गांव के लोगों को बांग्लादेश पर निर्भर करना पड़ रहा है.
उल्लेखनीय है कि फिलहाल जहां बाड़ लगी है, उसके पिलर से 150 गज के दायरे में यह गांव अवस्थित है. गांव की सीमा के बाद ही बांग्लादेश का भूखंड शुरू होता है. सरकारी रिकार्ड में यह गांव एडवर्स पोजेशन में आता है. यह पूरा गांव कांटेदार बाढ़ के बाहर बांग्लादेश भूखंड की तरफ है. इस गांव तक जाने के लिए पहले कूचबिहार जिले के हल्दीबाड़ी शहर जाना पड़ता है. वहां से दक्षिण बेरूबाड़ी ग्राम पंचायत के मालिकगंज होते हुए सीमावर्ती काटेदार बाड़ को पार करना होता है. कांटेदार बाड़ को पार करने के लिए बीएसएफ की विशेष अनुमति लेनी होती है. बाड़ के पार जाने पर एक छोटी सी नदी है कुड़ुम, जिसे पार करना होता है. इस नदी पर कोई पुल नहीं है. इसलिए लोगों को पैदल ही पार करना होता है.
स्थानीय ग्रामीण ताहिरुल सरकार ने बताया कि इलाज कराने के अलावा वे लोग बाजार-हाट के लिए भी बांग्लादेश के नारायणपुर, मुंशीपाड़ा, वीरपाड़ा और भाटियापाड़ा जाते हैं. उन्होंने कहा कि यदि गांव के बीच में बाड़ लगायी जाती है, तो गांव दोनों तरफ से कट जायेगा. एक अन्य निवासी अशराफुल सरकार ने बताया कि बाड़ को पारकर भारतीय भूखंड में जाने के लिए हमें कुड़ुम नदी पार करनी होती है. नदी के ऊपर पहले एक बांस का पुल था. लेकिन बाढ़ में बह जाने के बाद वहां दोबारा पुल नहीं बनाया गया. हालांकि इस बारे में क्षेत्रीय सांसद से लेकर जिला प्रशासन के अधिकारी तक को जानकारी है.
क्या कहते हैं अधिकारी
इस मसले को लेकर जलपाईगुड़ी जिले के अतिरिक्त जिला भूमि व भूमि राजस्व अधिकारी अधिकारी अम्लान ज्योति साहा ने कहा कि सीमा पर किस जगह से बाड़ लगायी जायेगी, यह अंतर्राष्ट्रीय सहमति का मामला है. इस बारे में जिला प्रशासन कुछ नहीं कर सकता. हालांकि स्थानीय कोई समस्या हो, तो प्रशासन ग्रामीणों की मदद कर सकता है.
क्या कहना है स्थानीय लोगों का
स्थानीय ग्रामीण नूर रहमान सरकार ने बताया कि कांटेदार बाड़ देने के बाद उनकी छह बीघा पड़ोसी बबलू सरकार के लघु चाय बागान की दो बीघा और सरीफुल और रवि सरकार की छह बीघा जमीन बांग्लादेश में चली जायेगी. इनके अलावा भी बहुत से लोगों की कृषि जमीन बांग्लादेश की ओर चले जाने का अंदेशा है. एक अन्य ग्रामीण ने बताया कि गांव के भीतर नये सिरे से कांटेदार बाड़ लगाये जाने पर ग्रामीणों का दैनंदिन जीवन संकट में पड़ जायेगा. उन्हें इलाज कराने के लिए बांग्लादेश के पचागढ़ जिला अस्पताल जाना पड़ता है. कारण कि भारतीय क्षेत्र का अस्पताल गांव से 50 किलोमीटर दूर जलपाईगुड़ी शहर में है. मालिकगंज और सातकुड़ा स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सकीय सेवा नहीं मिलती है. इसके अलावा कुड़ुम नदी पैदल पारकर बीएसएफ की अनुमति लेने के बाद भारतीय क्षेत्र में जाना चुनौतीपूर्ण है.
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