पहाड़ पर बेमियादी बंद जारी रखना मुश्किल

सिलीगुड़ी. दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में 90 दिनों से भी अधिक से समय से जारी गोरखालैंड आंदोलन की वजह से वहां की स्थिति पूरी तरह से अस्त-व्यस्त है. खासकर बेमियादी बंद की वजह से लोगों का जीना दूभर हो गया है. आम लोग गोरखालैंड राज्य बनाने के पक्ष में तो हैं, लेकिन बेमियादी बंद तत्काल खत्म […]
यही वजह है कि 90 दिनों से भी अधिक समय से पहाड़ के लोग न केवल बंद का समर्थन कर रहे हैं, बल्कि हर दिन जुलूस आदि में भी शामिल हो रहे हैं. लेकिन पिछले तीन-चार दिनों से पहाड़ की स्थिति बदलने लगी है. पुलिस की शक्ति के बाद जुलूस एवं रैलियों का दौर खत्म हो गया है. पहले जो लोग दिन भर रैलियां निकालते थे और थाने आदि का घेराव करते थे, वह सभी अब घरों से नहीं निकल रहे हैं.
उनके इस निर्देश के बाद कालिम्पोंग में कुछ गोरखालैंड समर्थक बंद के समर्थन में रैली निकालते देखे गये. तब पुलिस के साथ इनका संघर्ष भी हुआ था. पहाड़ के अन्य स्थानों पर गोरखालैंड समर्थक पिकेटिंग आदि करने के लिए बाहर नहीं निकले. स्वाभाविक तौर पर बिमल गुरूंग पर दबाव काफी बढ़ गया है. न केवल विरोधी, बल्कि उनके अपने रहे विनय तमांग तथा अनित थापा जैसे गोजमुमो नेता ही उनके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. एक पर एक दर्जनों मुकदमें दर्ज होने के बाद बिमल गुरूंग भूमिगत हो गये हैं. वह कहां हैं, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है. ऐसे पुलिस का मानना है कि बिमल गुरूंग पड़ोसी राज्य सिक्किम में कहीं छिपे हुए हैं. बिमल गुरूंग के विरोधी इसी का फायदा उठाते हुए बिमल गुरूंग को सामने आने की चुनौती दे रहे हैं. इस मामले में विनय तमांग का कहना है कि पहाड़ पर बेमियादी बंद से कुछ मिलने वाला नहीं है. बिमल गुरूंग को अपने गुप्त ठिकाने से बाहर निकल कर दार्जिलिंग आना चाहिए. दूसरी तरफ गोरामुमो की ओर से भी कुछ ऐसे ही मांग की जा रही है. गोरामुमो नेता महेन्द्र छेत्री का कहना है कि बिमल गुरूंग जहां भी कहीं हों, वह दार्जिलिंग आयें. राज्य के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो गई है. केन्द्र सरकार से भी गोरखालैंड को लेकर त्रिपक्षीय वार्ता बुलाने की मांग की जानी चाहिए. बिमल गुरूंग को भूमिगत नहीं होकर बातचीत की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए.
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