गोरखालैंड : विमल के सामने एक तरफ कुआं, दूसरी ओर खाई

Published at :03 Aug 2017 8:41 AM (IST)
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गोरखालैंड : विमल के सामने एक तरफ कुआं, दूसरी ओर खाई

सिलीगुड़ी: अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में पिछले 48 दिनों से जारी आंदोलन का कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है. पूरा पर्वतीय क्षेत्र बंद है और आम लोगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. खाने-पीने की चीजों की भारी कमी हो गयी है. काफी संख्या […]

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सिलीगुड़ी: अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में पिछले 48 दिनों से जारी आंदोलन का कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है. पूरा पर्वतीय क्षेत्र बंद है और आम लोगों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. खाने-पीने की चीजों की भारी कमी हो गयी है. काफी संख्या में लोग दार्जिलिंग, कर्सियांग, कालिंपोंग इलाके से पैदल चल कर किसी तरह से सिलीगुड़ी पहुंच रहे हैं. ये लोग अपने रिश्तेदार अथवा किराये का मकान लेकर रह रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में सभी के सामने एक ही सवाल है कि आखिर इस गतिरोध का अंत क्या है. न केवल राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार भी पूरे मामले में चुप्पी साधे बैठी हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गोरखालैंड आंदोलन की अगुआई कर रहे गोजमुमो सुप्रीमो विमल गुरुंग को भी इस प्रकार की जटिलता का अंदाजा नहीं रहा होगा. आंदोलन ने इतनी तेजी से एक बड़ा रूप धारण कर लिया कि विमल गुरुंग सहित गोजमुमो के तमाम आला नेता भी अवाक हैं. इनके हाथ में अब आंदोलन की कमान नहीं रह गयी है.

विमल गुरुंग के सामने एक तरफ कुआं तथा दूसरी तरफ खाई की स्थिति है. वह चाह कर भी बेमियादी पहाड़ बंद खत्म नहीं करा सकते. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, विमल गुरुंग को ऐसा लग रहा था कि आंदोलन शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद केंद्र में भाजपा सरकार आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए बुलायेगी और अलग राज्य की मांग को लेकर कोई न कोई कमेटी बना देगी. विमल गुरुंग का यही अनुमान फेल हो गया है. आलम यह है कि 48 दिनों के बाद भी केंद्र सरकार की ओर से आंदोलनकारियों के साथ बातचीत की कोई पहल नहीं की गयी है.

यहां तक कि दार्जिलिंग के भाजपा सांसद तथा केंद्रीय मंत्री एसएस अहलुवालिया भी आंदोलन के बाद से ही पहाड़ पर नहीं आ रहे हैं. सूत्रों की मानें तो उन्होंने गोजमुमो नेताओं से भी दूरी बना ली हैं. आंदोलन शुरू होते ही रोशन गिरि के नेतृत्व में गोजमुमो के 10 नेता दिल्ली गये थे. शुरू में एसएस अहलुवालिया तथा कुछ केंद्रीय मंत्रियों ने इनको भाव दिया. जैसे – जैसे पहाड़ पर आंदोलन ने तेज रूख अख्तियार किया वैसे-वैसे भाजपा नेताओं ने गोजमुमो से दूरी बना ली. गोजमुमो सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से दिल्ली में किसी भी केंद्रीय नेताओं से गोजमुमो नेताओं की न तो कोई बैठक हुई है आर ना ही बातचीत हुई है.

गोरखालैंड आंदोनलन को संचालित करने के लिए जिस सर्वदलीय गोरखालैंड मूवमेंट को-ऑर्डिनेशन कमेटी (जीएमसीसी)का गठन हुआ है, उसके प्रतिनिधियों से भी भाजपा सरकार के मंत्री नहीं मिल रहे हैं. जीएमसीसी द्वारा गोरखालैंड आंदोलन को दिल्ली में भी चलाने का निर्णय लिया गया है. इसी को ध्यान में रखते हुए जीएमसीसी के कई सदस्य इनदिनों दिल्ली में हैं. उसके बाद भी भाजपा नीत एनडीए सरकार के मंत्रियों ने किसी को भी मिलने के लिए नहीं बुलाया है. ऐसी परिस्थिति में गोजमुमो नेता अपने आप को ठगे महसूस कर रहे हैं.
वर्ष 2019 के चुनाव पर टिकीं भाजपा की निगाहें, एक सीट के लिए 42 पर दांव नहीं लगा सकती
गोजमुमो नेताओं का कहना है कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अपनी रणनीति बदल दी है. पहले एकमात्र दार्जिलिंग सीट पर जीत का लक्ष्य था.इसी को लेकर भाजपा ने गोरखालैंड की मांग पर विचार का आश्वासन दिया था. अब भाजपा की निगाहें सिर्फ दार्जिलिंग की एक सीट पर नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल के सभी 42 संसदीय सीटों पर टिकी हुई हैं. यही कारण है कि भाजपा गोरखालैंड मुद्दे पर दूरी बना रही है. गोजमुमो के तराई-डुवार्स क्षेत्र के अध्यक्ष शंकर अधिकारी ने इस बात को माना भी है. उन्होंने कहा कि पिछले महीने जब वि दिल्ली गये थे, तब कई भाजपा नेताओं से उनकी मुलाकात हुई थी और सभी ने कहा था कि आप लोगों ने जल्दी में आंदोलन कर दिया है. गोरखालैंड आंदोलन वर्ष 2019 के बाद होना चाहिए था. श्री अधिकारी ने कहा कि गोरखालैंड की मांग को लेकर भाजपा में दो मत है. कुछ नेता गोरखालैंड का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव तक इस मुद्दे से दूरी बनाये रखना चाहते हैं. श्री अधिकारी ने कहा कि भाजपा नेता यह मान कर चल रहे है कि राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अलग गोरखालैंड राज्य का विरोध कर बंगाली वोटरों को एक कर दिया है और आने वाले लोकसभा चुनाव में वह इसका फायदा उठाना चाहती है. ममता बनर्जी की इसी रणनीति से भाजपा नेताओं के कान खड़े हो गये और उन्होंने इस पूरे मुद्दे पर अपना हाथ खड़ा कर लिया.
क्या कहना है भाजपा का
भाजपा ने गोरखालैंड मुद्दे से किस तरह से दूरी बना ली है इसका अंदाजा जिला भाजपा महासचिव अभिजीत रायचौधरी के बयानों से स्पष्ट है. श्री चौधरी ने कहा कि दार्जिलिंग में कानून व्यवस्था की समस्या है और कानून व्यवस्था की स्थिति से निपटने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है. केंद्र सरकार का कोई भी हस्तक्षेप इस मामले में संघीय ढांचे में दखल होगा. उन्होंने इसके साथ ही पहाड़ पर बेमियादी बंद खत्म करने की भी अपील की और गोजमुमो तथा राज्य सरकार को अपनी ईगो की लड़ाई छोड़ कर बातचीत करने के लिए कहा. उन्होंने कहा कि बेमियादी बंद से ना केवल पहाड़ बल्कि सिलीगुड़ी को भी आर्थिक नुकसान हो रहा है. पूजा का मौसम सामने है. इसलिए जितना जल्दी हो बंद खत्म होना चाहिए.
क्या कहना है जीएमसीसी सदस्य का
जीएमसीसी सदस्य तथा एनसीपी के जिलाध्यक्ष फैजल अहमद ने केंद्र सरकार पर गोरखाओं को धोखा देने का आरोप लगाया है. मंगलवार को दिल्ली में आयोजित जीएमसीसी की बैठक में वह भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के तमाम मंत्री तथा भाजपा नेताओं ने गोरखालैंड आंदोलन के समर्थकों से अपनी दूरी बना ली है. दार्जिलिंग के सांसद एसएस अहलुवालिया पर गोरखालैंड आंदोलन को लोकसभा में उठाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन वह चुप्पी साधे हुए हैं. कुछ ही दिनों में लोकसभा का सत्र भी खत्म हो जायेगा. इससे साफ है कि भाजपा सांसद इस मुद्दे को संसद में उठाना ही नहीं चाहते. उन्होंने केंद्र तथा राज्य सरकार पर मिलीभगत का भी आरोप लगाया.
कम से कम कमेटी तो बने
यदि केंद्र सरकार गोरखालैंड की मांग पर कोई कमेटी बनाती है तो दार्जिलिंग पहाड़ पर जारी बेमियादी बंद खत्म होने के आसार बन जायेंगे. ऐसा संकेत गोजमुमो नेता शंकर अधिकारी ने दिया है. श्री अधिकारी ने कहा कि केंद्र की चुप्पी इस मामले में आश्चर्यजनक है. वह जानते है कि एक-दो बैठकों में अलग गोरखालैंड राज्य नहीं बन सकता. लेकिन इसकी पहल तो की ही जा सकती है. केंद्र सरकार यदि गोरखालैंड की मांग पर विचार करने के लिए एक कमेटी का भी गठन कर दे तो बात बन जाने की संभावना है. उन्होंने इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि पहाड़ के लोग अलग गोरखालैंड राज्य से कम कुछ भी मंजुर नहीं करेंगे.
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