सिलीगुड़ी: आर्थिक तंगी से तिल-तिल मर रहा एक परिवार

Updated at :13 Jun 2017 9:12 AM
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सिलीगुड़ी: आर्थिक तंगी से तिल-तिल मर रहा एक परिवार

सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी के एक नामी रंग मिस्त्री शंकर राय चौधरी (51) के खुद के और उनके पूरे परिवार के इलाज में आर्थिक तंगी रोड़ा बना हुआ है. सिलीगुड़ी के चंपासारी के निकट देवीडांगा निवासी शंकर खुद हृदयरोग से ग्रस्त हैं. पत्नी सीमा राय चौधरी (35) पति की बीमारी के बाद से ही मानसिक रोग से […]

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सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी के एक नामी रंग मिस्त्री शंकर राय चौधरी (51) के खुद के और उनके पूरे परिवार के इलाज में आर्थिक तंगी रोड़ा बना हुआ है. सिलीगुड़ी के चंपासारी के निकट देवीडांगा निवासी शंकर खुद हृदयरोग से ग्रस्त हैं. पत्नी सीमा राय चौधरी (35) पति की बीमारी के बाद से ही मानसिक रोग से ग्रस्त हो चुकी हैं. वहीं, दोनों बेटियां ब्यूटी (10) और जयंती (02) भी गंभीर रोगों से पीड़ित हैं.

बड़ी बेटी ब्यूटी 2010 साल से ही सिर और हड्डी दर्द और छोटी बेटी जयंती बीते दो महीने (अप्रैल-मई) से डायरिया जैसी रोग भुगत रही है. शंकर का कहना है कि उनको बीते वर्ष 26 नवंबर को हर्ट अटैक हुआ था. उसके बाद से ही उनका शरीर किसी कामकाज करने के लायक नहीं रहा. उन्होंने खुद के और पूरे परिवार के इलाज में जिंदगी भर की अपनी जमा पूंजी गंवा दी. आर्थिक सहयोग के लिए शंकर अब दर-दर भटकने को मजबूर हैं.

गंभीर बीमारी ने मेधावी छात्रा ब्यूटी की छुड़ायी पढ़ायी : सोमवार को लाचार शंकर ने प्रभात खबर को अपना और अपने परिवार की दुखड़ा सुनाते हुए बताया कि उसकी बड़ी बेटी ब्यूटी बचपन से ही पढ़ने में काफी मेधावी है. लेकिन उसकी गंभीर बीमारी ने पढ़ायी ही छुड़ा दी है. वह प्रधाननगर के मारग्रेट स्कूल के अंतरगत संचालित रामकृष्ण अरबन जूनियर बेसिक स्कूल में बीते वर्ष तीसरी कक्षा तक पढ़ी. बीमारी के वजह से इस साल से उसकी पढ़ाई बंद हो गयी है. वह प्रत्येक वर्ष ही अपने कक्षा में अव्वल रही है.
मंत्री और मेयर ने भी किया निराश : लाचार शंकर का कहना है कि वह अपनी और पूरे परिवार की पीड़ा और आर्थिक सहयोग के लिए पर्यटन मंत्री गौतम देव और सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर अशोक भट्टाचार्य के पास भी गुहार लगा चुके हैं. लेकिन कहीं से भी कोई सहयोग नहीं मिला. मंत्री ने सहयोग की आस जगायी थी और इसके लिए मैनाक लॉज स्थित अपने दफ्तर में अपने कर्मचारियों को कागजात जमा लेने के लिए निर्देश भी दिया था. लेकिन बाद में कर्मचारियों ने उसे दफ्तर से लज्जित करके बाहर का रास्ता दिखा दिया. अब लाचार शंकर किसी ऐसे देवदूत की आस लगाये बैठे है, जो उनके परिवार की ओर सहयोग का हाथ बढ़ाये और पूरे परिवार की इलाज के साथ-साथ बेटी की पढ़ाई का बीड़ा उठा सके.
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