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अब बंगाल से रोजगार के लिए बिहार जा रहे युवा : शुभेंदु

शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को राज्य सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि एक समय था, जब बिहार से लोग बंगाल में रोजगार की तलाश में आते थे. लेकिन अब यहां रिवर्स माइग्रेशन की स्थिति पैदा हो गयी है.

कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को राज्य सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि एक समय था, जब बिहार से लोग बंगाल में रोजगार की तलाश में आते थे. लेकिन अब यहां रिवर्स माइग्रेशन की स्थिति पैदा हो गयी है. अब बंगाल से युवा रोजगार के लिए बिहार की ओर कूच कर रहे हैं. यह दर्शाता है कि पश्चिम बंगाल में आर्थिक स्थिति व रोजगार की अवस्था कैसी हो गयी है.

सोमवार को शुभेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ के माध्यम से कहा कि प्रवासन एक वास्तविकता है. अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो पायेंगे कि मानव सभ्यता की वर्तमान रूपरेखा पर अगर किसी चीज ने सबसे ज्यादा प्रभाव डाला है, तो वह है प्रवासन. सदियों से लोग व्यापार या रोजगार की तलाश में विभिन्न स्थानों पर प्रवास करते रहे हैं. बाद में उन सभी स्थानों पर रहने लगे.

पश्चिम बंगाल की ओर देखें तो ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता एक प्रमुख व्यावसायिक केंद्र के रूप में स्थापित थी. विभिन्न मिलें, कारखाने, बंदरगाह, कार्यालय यहां स्थापित किये गये. विभिन्न कार्यों के लिए यहां श्रमिकों की आवश्यकता थी तो दूर-दूर से लोग काम की तलाश में कोलकाता आते रहे हैं. उन्होंने कहा कि राजस्थान के मारवाड़ और बिहार राज्य (वर्तमान झारखंड सहित) से बड़ी संख्या में लोग व्यवसाय और नौकरियों की तलाश में कोलकाता आये हैं.

पिछली शताब्दी के 80 के दशक तक यह तथ्य पूरे देश में सर्वविदित था. इसके बाद पश्चिम बंगाल में एक के बाद एक फैक्टरियों में ताले लगने शुरू हो गये. वाममोर्चा सरकार के तहत औद्योगिक माहौल और रोजगार के घटते अवसरों ने शिक्षित बंगाली युवाओं को काम की तलाश में दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, मुंबई, चेन्नई जैसी जगहों पर जाने के लिए मजबूर किया. लेकिन तृणमूल सरकार के दौरान रोजगार की स्थिति इस हद तक पहुंच गयी कि कोरोना-लॉकडाउन के दौरान पता चला कि 50 लाख बंगाली दूसरे राज्यों में प्रवासी श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं.

बंगाल के युवाओं की अंतिम कोशिश यहां सरकारी नौकरियां प्राप्त करने की थी. लेकिन इस मामले में तृणमूल सरकार ने इतना भ्रष्टाचार किया है कि जितनी कोई सीमा नहीं है. ममता बनर्जी सरकार ने योग्य लोगों की बजाय अयोग्य लोगों को नौकरियां बेच दी हैं, इसलिए आज शिक्षक के रूप में नौकरियों की तलाश में शिक्षित बंगाली नौकरी की परीक्षा में बैठने के लिए बिहार जा रहे हैं. कभी बिहारियों को रोजगार देने वाले पश्चिम बंगाल में अब यहां के बच्चे काम की तलाश में बिहार जा रहे हैं. क्या यही ममता बनर्जी की उपलब्धि है.

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