सीएम की कुर्सी संभाल चुके दिग्गज भी हार चुके हैं चुनाव

Updated at : 19 Mar 2026 10:31 PM (IST)
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सीएम की कुर्सी संभाल चुके दिग्गज भी हार चुके हैं चुनाव

पांच दशक तक बंगाल की राजनीति में नक्षत्र की भांति चमकने वाले दिवंगत नेता ज्योति बसु की लोग आज भी मिसाल देते हैं. एक बार वह प्रधानमंत्री बनने से भी चूक गये. श्री बसु 1977 से 2000 तक लगातार 23 साल तक बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते रहे. यह भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक लंबे समय तक चलने वाले कार्यकालों में से एक था.

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कोलकाता.

पांच दशक तक बंगाल की राजनीति में नक्षत्र की भांति चमकने वाले दिवंगत नेता ज्योति बसु की लोग आज भी मिसाल देते हैं. एक बार वह प्रधानमंत्री बनने से भी चूक गये. श्री बसु 1977 से 2000 तक लगातार 23 साल तक बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते रहे. यह भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक लंबे समय तक चलने वाले कार्यकालों में से एक था.

हालांकि 1972 के राज्य विधानसभा चुनावों में वह बरानगर निर्वाचन क्षेत्र से भाकपा उम्मीदवार से हार गये. इससे पहले, उन्होंने 1946 से 1971 तक हर विधानसभा चुनाव जीता था. अपने राजनीतिक जीवन काल में वह 1972 में अपना पहला और एकमात्र विधानसभा चुनाव हारे थे. 1972 में हार के बाद उन्होंने 1977 में भारी जीत हासिल की और राज्य में वाममोर्चा सरकार की नींव रखी.

1972 में हुए चुनाव में भाकपा के उम्मीदवार शिवपदो भट्टाचार्य ने हराया था. श्री भट्टाचार्य को 69,145 वोट मिले थे. वहीं, ज्योति बसु को 30,158 वोट मिले थे. हालांकि 1972 के विधानसभा चुनाव में ज्योति बसु को हराने वाले भाकपा नेता शिवपदो भट्टाचार्य को बाद में इस जीत का मलाल था, क्योंकि वह ज्योति बसु को श्रमिक वर्ग का वास्तविक नेता मानते थे. उनका कहना था कि अच्छा होता कि वह चुनाव ही नहीं लड़ते.

अपने ही मुख्य सचिव से बुद्धदेव भट्टाचार्य को होना पड़ा था पराजित

पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को 2011 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा था. अपनी ही सरकार के पूर्व मुख्य सचिव और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार मनीष गुप्ता ने उन्हें जादवपुर सीट से 16,684 वोटों से हराया था. इस हार के साथ ही वह 1967 के बाद अपनी सीट हारने वाले पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री बन गये थे. इस चुनाव में वाममोर्चा के 34 साल के शासन का अंत भी हुआ था. बता दें कि 1967 में प्रफुल्ल चंद्र सेन के बाद यह अपने निर्वाचन क्षेत्र से हारने वाले पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री थे. मनीष गुप्ता को 103,972 वोट मिले, जबकि बुद्धदेव भट्टाचार्य को 87,288 वोट मिले थे. यह सीट 1987 से वह लगातार जीतते आ रहे थे. 1967 में पार्टी बनने के बाद से यह पहली बार था जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) जादवपुर विधानसभा सीट हारी थी. मनीष गुप्ता ने ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के अधीन राज्य के मुख्य सचिव के रूप में काम किया था.

गत विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम से ममता बनर्जी को मिली थी हार

2011 में वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल करने के बाद ममता बनर्जी बंगाल की सबसे लोकप्रिय नेत्री के रूप में अपने छवि बनायी. उन्हें चुनावों में अजेय माना जाने लगा. उनकी पार्टी के नेता रहे शुभेंदु अधिकारी ने भाजपा का दामन थाम लिया. चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी को चुनौती दी. लेकिन जब नतीजे सामने आये, तो देखा गया कि ममता बनर्जी चुनाव हार गयी हैं. इस घटना ने सभी चौंका दिया. भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु ने ममता बनर्जी 1,956 वोटों से हराया था. शुभेंदु अधिकारी को 1,10,764 मत मिले, जबकि ममता बनर्जी को 1,08,008 वोट मिले थे.

1967 में मुख्यमंत्री रहे प्रफुल्ल चंद्र सेन भी हार गये थे विधानसभा चुनाव

1967 के राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन को आरामबाग सीट पर बांग्ला कांग्रेस के अजय मुखर्जी ने 881 मतों से हराया था. यह हार राज्य में खाद्यान्न संकट और खाद्य राशनिंग नीति के कारण उत्पन्न जन आक्रोश के चलते हुई, जिससे कांग्रेस की सत्ता गयी और पहली संयुक्त मोर्चा सरकार बनी. अजय मुखर्जी बाद में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने. प्रफुल्ल चंद्र सेन को आरामबाग का गांधी के रूप में भी जाना जाता था, जो अपनी सादगी के लिए प्रसिद्ध थे.

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