वित्तीय अपराध रोकने के लिए पीएमएलए के तहत इडी के पास व्यापक शक्तियां

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वित्तीय अपराध रोकने के लिए पीएमएलए के तहत इडी के पास व्यापक शक्तियां

वित्तीय अपराध रोकने के लिए पीएमएलए के तहत इडी के पास व्यापक शक्तियां

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कोलकाता.

भारत में वित्तीय अपराधों और भ्रष्टाचार की जांच से जुड़े कानूनों में विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला मील का पत्थर साबित हुआ है. इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (इडी) की व्यापक शक्तियों को बरकरार रखा है.

इस संबंध में प्रभात खबर के ऑनलाइन सवालों का जवाब देते हुए कलकत्ता हाइकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता देवब्रत उपाध्याय ने कहा कि न्यायालय ने इडी द्वारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया, संपत्ति की कुर्की और जमानत की कठोर ””दोहरी शर्तों”” (ट्वीन बेल कंडिशंस) की वैधानिकता की पुष्टि की, जिससे एजेंसी की कार्यप्रणाली को मजबूती मिली. हाल ही में, सेंथिल बालाजी बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2024) के मामले ने भी एक नया आयाम जोड़ा है. इसमें न्यायालय ने इसीआइआर (प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट) दर्ज होने के बाद इडी के गिरफ्तारी के अधिकार की तो पुष्टि की, लेकिन साथ ही यह भी अनिवार्य किया कि कार्यवाही में प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का पालन किया जाना चाहिए. जहां एक ओर इडी की शक्तियों पर चर्चा जारी है. दूसरी ओर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के अधिकार क्षेत्र पर भी महत्वपूर्ण निर्णय आये हैं.

पश्चिम बंगाल राज्य बनाम लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण के लिए समिति (2010) के फैसले ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीइ) अधिनियम के तहत किसी राज्य में जांच के लिए राज्य सरकार की सहमति लेने की सीबीआइ की आवश्यकता को पुनः पुष्ट किया. ये सभी मामले सामूहिक रूप से इडी और सीबीआइ की शक्तियों पर चल रही उस व्यापक बहस का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य जांच एजेंसियों की स्वायत्तता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के बीच एक उचित संतुलन बनाना है.

सवाल : नगरपालिका में मुझे 1992 में अनुसेवक के पद पर नियुक्त किया गया था. एक साल बाद स्थायीकरण को रद्द कर दिया गया. बाद में वर्ष 2011 में हमलोगों को स्थायी किया गया. वर्ष 2017 में मैं विभाग से सेवानिवृत्त हो गया, लेकिन हमें पेंशन नहीं मिल रहा. क्या करना होगा?

संजय शर्मा, बैरकपुर

जवाब : इसे लेकर अधिवक्ता से बात करते हुए हाइकोर्ट में याचिका दायर करें. यदि आपकी नियुक्ति प्रक्रिया के तहत हुई है, तो आपको अवश्य न्याय मिलेगा.

सवाल : मैंने डेढ़ वर्ष पूर्व एक दंपती को 7.50 लाख रुपये दोस्ताना कर्ज दिया था, लेकिन अब वे रुपये वापस करने में टाल-मटोल कर रहे हैं. मैंने कोर्ट में केस किया है, जिसके बाद महिला द्वारा कई बार मुझ पर झूठा आरोप लगाकर पुलिस से धमकी दिलायी जा रही है, जबकि मैं एक बुजुर्ग हूं. क्या करना होगा?

अविनाश महतो, श्रीरामपुर

जवाब : आप इसकी शिकायत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से कर सकते हैं.

सवाल : इलाके में कुछ लोगों द्वारा मेरे साथ मारपीट की गयी. इसकी शिकायत मैंने थाने में की, लेकिन पुलिस द्वारा दबाव बना कर समझौता कराने का प्रयास किया जा रहा है. पूर्व में भी इस तरह की घटना घट चुकी है. थाना में पुलिस द्वारा मेरा केस नहीं लिया जा रहा है. क्या करना होगा?

रामबचन सिंह, जगदल

जवाब : आप इसकी शिकायत वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारी से करें. कार्रवाई नहीं होने पर कोर्ट में केस फाइल करें.

सवाल : एक सड़क हादसे की वजह से मैं दिव्यांग हो गया हूं. मेरे सरकारी बैंक के खाते में कुछ माह मेरी पेंशन भी आयी. इसके बाद पेंशन आना बंद हो गया. क्या करूं?

अखिलेश यादव, कमरहट्टी

जवाब : आप बैंक के मैनेजर से फोन के माध्यम से संपर्क कर अपनी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दें और उनसे बैंक के किसी कर्मचारी को घर भेजने की मांग करें. वह अवश्य आपकी बात सुनेंगे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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Bijay Kumar

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