हिंदी विश्वविद्यालय में संस्कृत सप्ताह का उदघाटन

Updated at : 25 Aug 2018 1:27 AM (IST)
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हिंदी विश्वविद्यालय में संस्कृत सप्ताह का उदघाटन

वर्धा/कोलकाता : संस्कृत में ज्ञान का भंडार है. यह मनुष्य की भविष्य की चिंता करनेवाली भाषा है. संस्‍कृत केवल भाषा नहीं, अपितु संपूर्ण जीवन दर्शन है. संस्कृत आनेवाले युग की आवश्यकता है. उक्त उद्बोधन दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य, संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान प्रो. चांद किरण सलूजा ने दिये. वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय […]

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वर्धा/कोलकाता : संस्कृत में ज्ञान का भंडार है. यह मनुष्य की भविष्य की चिंता करनेवाली भाषा है. संस्‍कृत केवल भाषा नहीं, अपितु संपूर्ण जीवन दर्शन है. संस्कृत आनेवाले युग की आवश्यकता है. उक्त उद्बोधन दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य, संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान प्रो. चांद किरण सलूजा ने दिये.
वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का संस्‍कृत विभाग एवं संस्‍कृत भारती, वर्धा के संयुक्‍त तत्वावधान में विश्वविद्यालय में संस्कृत सप्ताह के उदघाटन समारोह में बतौर मुख्‍य अतिथि बोल रहे थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने की. 23 से 29 अगस्त तक संस्कृत सप्ताह मनाया जा रहा है, जिसका उदघाटन गुरुवार, 23 अगस्त को श्यामा प्रसाद मुखर्जी भवन में किया गया.
इस अवसर पर साहित्य विद्यापीठ की अधिष्ठाता प्रो. प्रीति सागर, शिक्षा विद्यापीठ के अध्यक्ष प्रो. गोपाल कृष्ण ठाकुर, संस्कृत भारती, वर्धा के विदर्भप्रांत सहमंत्री संजीव लाभे, विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग प्रभारी अध्यक्ष एवं संयोजक लेखराम दन्नाना मंचासीन थे.
कार्यक्रम का प्रारंभ स्वगत गीत एवं दीप प्रज्जवलन से किया गया. प्रास्ताविक लेखराम दन्नाना ने किया.
उन्होंने कहा कि वर्धा शहर के सभी महाविद्यालयों और विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन सप्‍ताह के अंतर्गत किया जा रहा है. अतिथियों का स्‍वागत डॉ श्रीनारायण सिंह, डॉ वागीश राज शुक्‍ल, डॉ शिरीष पाल सिंह, सुधा त्रिपाठी ने किया.
मुख्य अतिथि प्रो. चांद किरण सलूजा का स्वागत कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने शॉल, चरखा एवं सूत माला से किया.
अध्यक्षीय वतव्य में प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि संस्कृत के महत्व को देखते हुए उसे जनभाषा बनाने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि सारे चिंतन में एक ही केंद्रीय भावना है. सकारात्मक परिवर्तन का भाव संस्कृत की चेतना में निहित है. संस्कृत का ज्ञान सभी को बांटने और उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर उन्होंने बल दिया.
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