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पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान की खरीद-बिक्री महंगी पड़ सकती है

कोलकाता: महानगर में हजारों टन ई-वेस्ट या इलेक्ट्रॉनिक कचरा कबाड़ी इकट्ठा करते हैं. इनमें से कुछ हिस्सों को तोड़ कर अलग बेच दिया जाता है, जबकि कुछ इलेक्ट्रानिक सामानों में थोड़ा सुधार कर वापस यानी सेकेंड हैंड में बेच दिया जाता है. चांदनी चौक इलाका समेत महानगर में कई ऐसे इलाके हैं, जहां फुटपाथ पर […]

कोलकाता: महानगर में हजारों टन ई-वेस्ट या इलेक्ट्रॉनिक कचरा कबाड़ी इकट्ठा करते हैं. इनमें से कुछ हिस्सों को तोड़ कर अलग बेच दिया जाता है, जबकि कुछ इलेक्ट्रानिक सामानों में थोड़ा सुधार कर वापस यानी सेकेंड हैंड में बेच दिया जाता है. चांदनी चौक इलाका समेत महानगर में कई ऐसे इलाके हैं, जहां फुटपाथ पर सेकेंड हैंड में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचे जाते हैं. जानकारों की माने तो कभी-कभी ऐसे इलेक्ट्रानिक सामान खरीदना व बेचना महंगा पड़ जाता है, क्योंकि यह स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी सही नहीं है और आर्थिक दृष्टिकोण से भी.
मोबाइल की पुरानी बैटरी का होता है इस्तेमाल : महानगर के कई इलाकों के फुटपाथ पर कम निवेश और जानकारी के अभाव में सस्ते में इलेक्ट्रॉनिक सामानों की बिक्री होती है. असल में ये उपकरण इसलिए सस्ते होते हैं, क्योंकि इन्हें दोबारा बनाने के लिए पुरानी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें से इमरजेंसी लाइट एक है. इमरजेंसी लाइट फुटपाथ पर करीब 50 रुपये से 150 रुपये तक की कीमत में आसानी से मिल जाती हैं.

असल में कई इमरजेंसी लाइटों में मोबाइल फोन की पुरानी बैटरी की इस्तेमाल किया जाता है. यानी इमरजेंसी लाइट को चार्ज करने के दौरान बैटरी जल्दी फूल जाती है जो बेहद खतरनाक होती है. यानी ऐसी बैटरी के इस्तेमाल से बलास्ट का खतरा ज्यादा होता है. ठीक ऐसे ही पुराने कंप्यूटर के मानिटर्स के पिक्चर ट्यूब के इस्तेमाल से सस्ते टेलीविजन सेट स्थानीय स्तर पर तैयार किये जाते हैं. यह भी काफी नुकसान पहुंचा सकता है. फुटपाथ पर काफी सस्ते में मल्टीपल चार्जर बेचे जाते हैं, जिसमें एक पोर्ट में कई सारे चार्जर लगे होते हैं. ऐसे चार्जरों में फोन चार्जिंग के लिए वोल्टेज का कोई पैमाना नहीं होता है, यानी ऐसे चार्जर्स के इस्तेमाल से फोन खराब होने की संभावना होती है. कोशिश यही करनी चाहिए कि जिस ब्रांड का फोन हो उसी का चार्जर लें. ऐसे ही पुराने कंप्यूटर, टीवी, रेडियो, मोबाइल फोन, वॉशिंग मशीन, माइक्रोवेब ओवन, सीडी प्लेयर, पंखा, इसीजी उपकरण, माइक्रोस्कोप, कार्यालयों में सीपीयू, फैक्स मशीन, फोटोकॉपी मशीन, स्कैनर, ट्यूबलाइट, एयरकंडीशनर भी बेचे जाते हैं, जो ई-वेस्ट की श्रेणी में आता है.

नुकसानदेह है इ-वेस्ट
एसएसकेएम अस्पताल के चिकित्सक डॉ कुंतल माइति ने बताया कि ई-वेस्ट यानी जहां पुराने इलेक्ट्रॉनिक्स सामान स्टोर होता है, केवल वहां ही नहीं बल्कि आसपास के इलाकों के लोग भी उससे प्रभावित होते हैं. पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान में घातक कैमिकल्स होते हैं. घर में पड़ा रहनेवाला प्लास्टिक डायोक्सीन गैस उत्पन्न करता है. यदि ऐसे घातक कैमिकल्स का एक से दो मिलीग्राम भी शरीर के अंदर चला गया तो लोग कई बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इसका असर लंबे समय के बाद दिखता है. ई-वेस्ट के घातक कैमिकल्स के प्रभाव से कैंसर भी हो सकता है. फेफड़ा व किडनी संबंधित बीमारी भी हो सकती है. ई-वेस्ट से पानी व मिट्टी दूषित होते हैं.
महानगर में इ-वेस्ट प्रबंधन एक चुनौती : महानगर में ई-वेस्ट का भार बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन इसके प्रबंधन की व्यवस्था नहीं है. महानगर में यह एक चुनौती से कम नहीं है, जो पुराने इलेक्ट्रिक सामान नहीं बेचे जा सकते हैं, उसे महानगर के काशीपुर, राजाबाजार, तारातल्ला, पार्क सर्कस, तपसिया, धापा, टेंगरा में ई-वेस्ट को खुले में जला दिया जाता है. यह स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह होता है. एक सर्वेक्षण के अनुसार महानगर के 84 फीसदी लोग ई-वेस्ट प्रबंधन के विषय में नहीं जानते हैं. 65 फीसदी लोग कबाड़ीवाले को ई-वेस्ट बेच देते हैं, जबकि नियम के अनुसार ई-वेस्ट को अलग से बेचना होता है. निगम के मेयर परिषद सदस्य (ठोस, कचरा प्रबंधन विभाग) देवव्रत मजुमदार ने बताया कि महानगर में ई-वेस्ट कहां फेंके या डंप किये जायें, इसकी व्यवस्था नहीं है.

Prabhat Khabar Digital Desk
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