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डिजिटल दुनिया से घटा पतंगबाजी का क्रेज, गगन से गुम हो रहीं रंग-बिरंगी पतंगें

शहर दुर्गापुर में पतंगबाजी का क्रेज कम हो रहा है. क्योंकि बच्चों और युवाओं का ध्यान मोबाइल और लैपटॉप की तरफ जा रहा है.

दुर्गापुर.

शहर दुर्गापुर में पतंगबाजी का क्रेज कम हो रहा है. क्योंकि बच्चों और युवाओं का ध्यान मोबाइल और लैपटॉप की तरफ जा रहा है.बच्चे और युवा मोबाइल गेम्स और इंटरनेट में ज्यादा व्यस्त रहते हैं, जिससे बाहर जाकर पतंग उड़ाने का समय नहीं मिलता. जिसके कारण मकर संक्रांति के मौके पर पतंगों से भरा रहने वाला शहर का आकाश आज उदास सा दिख रहा है. हालांकि अभी भी कुछ लोग परंपरा को कायम रखे हुए हैं. लेकिन उनकी संख्या काफी सीमित है. पतंग बाजी का क्रेज कम होने का असर इसकी बिक्री पर भी पड़ता दिख रहा है. शहर के घोष मार्केट और साल बागान सहित अन्य इलाके में पतंग बिकने वाले दुकान आज सुनसान दिख रहे है.

क्रेज कम होने के मुख्य कारण

पतंगबाजी के क्रेज में कमी के लिए सबसे बड़ा कारण बच्चों का डिजिटल दुनिया में कैद माना जा रहा है. वही शहर में खुले मैदानों की कमी और फ्लैट कल्चर बच्चों को पतंगबाजी से रोकता है.बढ़ती बहुमंजिला इमारतों और बिजली के तारों के जाल के कारण पतंग उड़ाने के लिए खुले मैदानों या सुरक्षित छतों की कमी भी पतंगबाजी के क्रेज को कम कर रही है.

पतंगों की मांग में आयी कमी

पतंग विक्रेता श्यामल पाल ने बताया कि हर त्यौहार बच्चो के बिना कुछ भी नहीं है. बच्चे ही त्योहारों की रौनक होते है. मगर आज बच्चे मोबाइल की दुनियां में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि त्यौहार, संस्कृति का महत्व भी पूरी तरह से भूल चुके हैं. जिसके परिणाम स्वरूप आज पतंगों की बिक्री काफी गिर चुकी है. पहले बाजारों में पतंगबाजी दिसंबर महीने से ही शुरू हो जाया करती थी.

क्या कहते हैं पुराने पतंगबाज

शहर के पुराने पतंगबाज मुकेश शर्मा ने बताया कि कि एक समय में सक्रांति से पूर्व 25 दिसंबर से पतंग उड़ना शुरू हो जाया करती थी, आकाश में पतंग ही पतंग दिखा करती थी. मगर आज मोबाइल में व्यस्त युवा त्योहारों का महत्व और संस्कृति को भूलते जा रहा हैं. पहले मकर संक्रांति आने से पहले लोग जहां पतंग खरीद कर रख लेते. वही डोर में माझा भी लगा कर तैयार रहते . माझे के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती थी. वहीं, शंभु साव ने बताया कि दिसंबर महीने के दूसरे हफ्ता से ही शहर में पतंगबाजी शुरू हो जाती थी. जो पूरे जनवरी महीने के बाद तक चलतीं थी.

मकर संक्रांति पर पतंग बाजी का अलग जुनून रहता था. इस दिन बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सुबह से लेकर शाम तक पतंग उड़ाते थे और आस पड़ोस में एक दूसरे की पतंग काटते थे. पवन साह ने बताया कि पतंग उड़ाने और लूटने का जमाना चला गया है. आजकल के बच्चों के पास इसके लिए समय नहीं है. उन्होंने बताया कि पहले हर मोहल्ले में कई पतंगबाज होते थे.जो पतंगबाजी करते और पैच लड़ाते. पैच लड़ाने में माहिर पतंगबाज को लोग मोहल्ले के बाहर भी पहचानते थे. उनका अलग रुतबा होता था.

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