वीरभूम: पाडुई के ग्रामीणों में भारी दहशत

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पानागढ़ : वीरभूम जिले के पाड़ुई थाना क्षेत्र विगत एक वर्ष से राजनीतिक हिंसा प्रतिहिंसा व खुनी झड़पों का केंद्र बिंदू बना रहा. बार बार राजनीतिक संघर्ष के कारण पाड़ुई थाना का चौमंडलपुर, भेडामारी, सिमुलिया सह कई गांव बम विस्फोट से थर्राते रहे. विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद वेाटरों के साहस दिलाने जिला शासक […]

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पानागढ़ : वीरभूम जिले के पाड़ुई थाना क्षेत्र विगत एक वर्ष से राजनीतिक हिंसा प्रतिहिंसा व खुनी झड़पों का केंद्र बिंदू बना रहा. बार बार राजनीतिक संघर्ष के कारण पाड़ुई थाना का चौमंडलपुर, भेडामारी, सिमुलिया सह कई गांव बम विस्फोट से थर्राते रहे.
विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद वेाटरों के साहस दिलाने जिला शासक पी मोहन गांधी व पुलिस अधीक्षक मुकेश कुमार पहुंंचे थे. परिस्थिति में सुधार के बावजूद अब भी पूरा क्षेत्र बम व बारुद के ढेर पर है.
मतदाता आतंक के बीच दिन काट रहे है. भाजपा जिला अध्यक्ष चित्तरंजन सिंह ने कहा कि गांव में रक्तपात हो रहा था, घरो को लूटा जा रहा था, तब प्रशासन एक बार झांकने भी नहीं पहुंचा. चुनाव आयोग का दबाब पड़ते ही उसकी पहल शुरू हुयी है. पाड़ुई में एक के बाद एक राजनीतिक हिंसा होती रही. भाजपा और तृणमूल के बीच संघर्ष और खुनी झड़प के बीच कई को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा. वर्ष 2014 के अंत के समय ही पाड़ुई थाना के माकड़ा ग्राम में भाजपा नेता शेख तौसिफ की हत्या हुयी थी. इसके बाद चौमंडलपुर में एक और भाजपा नेता शेख जसीमुद्दीन की हत्या हुयी थी.
हिंसा और मास्केट वाहिनी के हमले के बीच तृणमूल कर्मी शेख मोजामूल भी राजनीतिक हिंसा के शिकार बने. सालान गांव में शेख सुलेमान को अपने प्राण से हाथ धोना पड़ा. इसके बाद लगातार थम थम कर विगत डेढ़ वर्षो तक हिंसा प्रतिहिंसा व राजनीतिक झड़प के बीच पुरा क्षेत्र बमो व बारुद की आवाज से दहलता रहा. भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं के शासक दल में शामिल हो जाने के बाद यह हिंसा का रुप गोष्ठी द्वंद के बीच परिणत हो गया. इलाके में कई गांवों में शासक दल का प्रभाव बढ़ने के बावजूद कुछ गांवों में भाजपा का प्रभाव बना ही रहा.
ग्रामीण बीरबल साहा ने कहा कि अभी परिस्थिति शांत है लेकिन अब भी शाम के बाद घरों से बाहर कोई नहीं निकलता. दहशत अभी भी कायम है. भेडामाडी गांव के ग्रामीणों का कहना है कि प्राय ही राजनीतिक संघर्ष के कारण पूरा क्षेत्र अशांत रहता था. वोट की बात पर कुछ ग्रामीणों ने कहा कि यहां शासक दल द्वारा फतवा जारी कर दिया जाता है. वोट आने से ही आतंक और बढ़ जाता है. केंद्रीय वाहिनी सुरक्षा नहीं दे पाती हैं. चुनाव के बाद यहीं जीना मरना है. सिमुलिया गांव के लोगों में भी बमों का दहशत अब भी बरकरार है.
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