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सेना का राजनीतिकरण पाक बनने की कवायद

Updated at : 18 Apr 2019 1:28 AM (IST)
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सेना का राजनीतिकरण पाक बनने की कवायद

1965,1971, 1999 में पाक पर जीत का किसी पीएम ने नहीं लिया था क्रेडिट अभिनंदन की वापसी का क्रेडिट लेनेवाले सभी युद्धबंदियों की सूची करें सार्वजनिक दो सौ वरीय पूर्व सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर जतायी है नाराजगी आसनसोल : वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध के हीरो रहे कर्नल (रिटायर्ड)दीप्तांशु चौधरी […]

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1965,1971, 1999 में पाक पर जीत का किसी पीएम ने नहीं लिया था क्रेडिट

अभिनंदन की वापसी का क्रेडिट लेनेवाले सभी युद्धबंदियों की सूची करें सार्वजनिक

दो सौ वरीय पूर्व सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर जतायी है नाराजगी

आसनसोल : वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध के हीरो रहे कर्नल (रिटायर्ड)दीप्तांशु चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नेतृत्व भारतीय सेना का राजनीतिकरण कर पाकिस्तान के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन पांच सौ पुरानी भारतीय सेना को बदलना असंभव है. विशेष भेंट में बुधवार को उन्होंने कहा कि वर्ष 1965, वर्ष 1971 तथा वर्ष 1999 में पाकिस्तानी सेना को धूल चटाने के समय भी किसी भी प्रधानमंत्री ने सेना का राजनीतिकरण नहीं किया था.

उन्होंने कहा कि इससे दु:खित होकर ही दो सौ से अधिक वरीय सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति से शिकायत कर अपनी नाराजगी जताई है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि इस पर रोक नहीं लगी तो सेना का मनोबल गिरेगा और इसका खामियाजा भविष्य को भुगतना होगा.

वर्ष 1992 में भारतीय सेना में योगदान करनेवाले कर्नल चौधरी ने वर्ष 2015 तक सेना तथा देश की सेवा की. विभिन्न मोर्चों पर कार्य करने के बाद 14 अप्रैल, 1999 में उनकी पदास्थापना कारगिल के मोर्चे पर की गई. पहले दिन से ही वे युद्ध में शामिल हुए. 27 जुलाई को भले ही जंग की समाप्ति हुई हो, उनकी पदास्थापना उसी मोर्चे पर बनी रही. सितंबर में जब बर्फबारी शुरू हुई और सीमा सुरक्षित हो गई तो वे मोर्चे से वापस लौटे. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना पांच सौ वर्ष पुरानी है. पहले इसे रॉयल इंडियन आर्मी के नाम से जाना जाता था, आजादी के बाद इसे इंडियन आर्मी का नाम दिया गया.

उन्होंने कहा कि सेना सीमा पर रक्षा करने के साथ ही देश के आंतरिक हिस्से में आई विपदा के समय अपने दायित्वों का निर्वाह करती है. इसमें राष्ट्र सवोर्परि होता है तथा सभी धर्मों तथा जाति के जवान तथा अधिकारी परिवार की तरह रहते हैं. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से ही सेना के खाते में लगातार उपलब्धियां रही है. वर्ष 1971 मे एक साथ 90 हजार पाक सैनिकों को सरेंडर कराकर युद्ध का विश्व में इतिहास रच दिया. लेकिन सेना की इस उपलब्धि का क्रेडिट कभी किसी प्रधानमंत्री ने नहीं लिया. कर्नल चौधरी ने कहा कि वर्ष 2014 के बाद से ही सेना की उपलब्धियों की राजनीतिकरण शुरू हुआ.

चाहे वह नॉर्थ ईस्ट का मामला हो या नियमित रूप से होनेवाली सजिर्कल स्ट्राइक का. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सेना की आलोचना होती है कि वह राजनीति को नियंत्रित करती है. लेकिन भारत में भी सेना को राजनीति में घसीटने की कोशिश जारी है. उन्होंने कहा कि विंग कमांडर अभिनंदन की वापसी को राजनीति का मुद्दा प्रधानमंत्री तथा एनडीए की सरकार ने बनाया. लेकिन देश के 98 युद्धबंदी अभी भी पाकिस्तानी जेलों में यंत्रणा भुगत रहे हैं. श्री मोदी उनकी रिहाई की पहल क्यों नहीं करते? सभी युद्धबंदी सैन्य अधिकारियों तथा जवानों की सूची सरकार सार्वजनिक करें तो सक्रियता समझ में आ जायेगी.

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