चातुर्मास में सृष्टि गुरुशक्ति के भरोसे
गुरु तिथि का तत्व, महत्व व अमरत्व तंत्रयोगी आनंद सिंह कोलकाता : जब देवगण आषाढ़ शुक्लपक्ष में पड़नेवाली हरिशयनी एकादशी से सो जाते हैं, तब सृष्टि के संचालन का कार्यभार गुरु एवं गुरुशक्ति पर होता है. पावस या सावन के पूर्वार्ध से शरद-ऋतु के अंत यानी चातुर्मास काल में जगत के कल्याणार्थ गुरुशक्ति ही क्रियाशील […]
गुरु तिथि का तत्व, महत्व व अमरत्व
तंत्रयोगी आनंद सिंह
कोलकाता : जब देवगण आषाढ़ शुक्लपक्ष में पड़नेवाली हरिशयनी एकादशी से सो जाते हैं, तब सृष्टि के संचालन का कार्यभार गुरु एवं गुरुशक्ति पर होता है. पावस या सावन के पूर्वार्ध से शरद-ऋतु के अंत यानी चातुर्मास काल में जगत के कल्याणार्थ गुरुशक्ति ही क्रियाशील रहती है. अतएव आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. गुरु पूनम तो गुरु चरणों की पूजा कर उनके महती कार्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन की अनुपम तिथि है.
सनातन धर्म की विभिन्न धाराओं में चातुर्मास एवं गुरु-चरणों की वंदना में एकरसता पायी गयी है.
‘गुरु’ शब्द पर भिन्न-भिन्न मत एवं पथ, अपने बौद्धिक ज्ञान, समझ व भाषानुरूप आख्यायित किये गये हैं. मूल रूप से ‘गु’- का अर्थ है अन्यकार और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश. अभिप्राय हुआ अन्यकार से प्रकाश की ओर ले जानेवाला. गुरु तो सृष्टि का कण-कण है, जिनसे हमें ज्ञान मिलता है. परंतु सद्गुरु एक ही हैं. सद्गुरु का अर्थ है – जिसने सत्य को जान लिया हो. अब जिसने सत्य को जान लिया, वह सत्य दिखेगा, सत्य बोलेगा और उसने जो बोल दिया, सो सत्य ही होगा. इसके अलावा अन्य नहीं.
रूप, स्वरूप, सिद्धांत और कार्य-पद्धति में भिन्नता होते हुए भी समस्त गुरुओं में एक ही गुरुशक्ति कार्य करती है. यह गुरुशक्ति, शक्ति का वह भाग है, जो साधक की स्वयं शक्ति से युक्त होकर उसके शक्तिकोष को समृद्ध करती है.
उसके संचय-क्षण में स्थिति, शक्ति के ह्रास या काल-प्रवाह को कम कर देती है. इस प्रकार देखा गया कि शिवत्व का क्षरण प्राय: उस स्थिति में क्षीण हो जाता है.
अत: साधक/ शिष्य को गुरुशक्ति के संचय व उसकी युति से अपने को हर क्षण अथवा तत्क्षण युक्त रखना अनिवार्य हो जाता है. उद्देश्य है अखंड सत्ता की अनुभूति, जिसमें एकरसता को प्राप्त किया जा सके.
सामान्य गुरु, इष्ट एवं मंत्र दीक्षा की बात करते हैं, परंतु सद्गुरु उनसे परे ‘नाम’ को बताते हैं. उद्देश्य होता है दर्शन. सांख्य-दर्शन के प्रणोता महर्षि कपिल के अनुसार लोक एवं वेद दोनों सुखमार्ग नहीं हैं. इनसे विपरीत दु:खों से पूर्ण छुटकारा का रास्ता है – व्यक्त = (जगत), अव्यक्त =(प्रकृति), ज्ञ =(चेतन पुरुष) का विवेक. आशय है, चेतन पुरुष जब अव्यक्त जड़ प्रकृति तथा व्यक्त जड़ जगत से अपने ज्ञान स्वरूप को पृथक समझ अपने आप में स्थित हो जाता है, तब वह सारे दु:खों से मुक्त हो जाता है.
गुरुपूजा में शिष्य अपनी कुल आय का एकांश दक्षिणा रूप में गुरु को अर्पण करता है. (जान लें कि गुरु को किया गया अर्पण – दान भाव नहीं, वरन कर्तव्य बोध हो) गुरु से प्राप्त प्रसाद शिष्य की ज्ञान आयु में श्रीवृद्धि करता है. यहां सद्गुरु घोर आंगिरस-कृष्ण संवाद की एक पंक्ति सार्थक है – जो व्यक्ति, तप, दान, सरलता, अहिंसा व सत्य वचन में जीवन बिताता हो, मानो उसका जीवन ही दक्षिणा का जीवन है. सत्य है, अगर जीव, जीवनमूल्यों को सिद्धांत-उद्देश्य एवं लक्ष्यानुरूप कर दे, तो यह सबसे श्रेयस्कर है.
माता-पिता अज्ञानी पुत्र नहीं चाहते, तब भला गुरु क्यों शिष्य बनाने लगा. सद्गुरु तो तद्नुरूप गुरु बनाने की इच्छा रखते हैं. वैसे ही जैसे भृंगी कीट अन्य कीटों को अपने अनुरूप बना लेता है. अत: सद्गुरु की इच्छा, अभिलाषा-शक्ति व श्रम को गुरु बनाने की होती है, ना कि शिष्य की. उनकी दृष्टि कछुए-सी होती है. संवाद मौन एवं संस्पर्श एक डंडी विद्युतीय तरंग से भी तीव्र, जो सातों चक्रों को क्षण में भेद सके.
(लेखक अखंड महायोग के अनुगामी ब्रह्मलीन योगिराज दादा सीताराम के मानस पुत्र हैं, जो उत्तर कोलकाता में रहते हैं.)
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