लखनऊ में किला, मस्जिद और कब्रिस्तान पर क्यों मचा था बवाल? जानिए महाराजा कंस पासी से जुड़े दावों की पूरी कहानी

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मलिहाबाद किला

मलिहाबाद किला

UP News: लखनऊ के कासमंडी इलाके में एक प्राचीन किले, मस्जिद और कब्रिस्तान को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद खड़ा हो गया है। मामला महाराजा कंस पासी के ऐतिहासिक दावे से जुड़ा है, जिसने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।

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UP News: कहते हैं... इतिहास की धूल में दबी कहानियां जब वर्तमान के दरवाजे पर दस्तक देती हैं, तो सिर्फ पुराने पन्ने ही नहीं खुलते... बल्कि आस्था, पहचान और विरासत से जुड़े सवाल भी सामने आ खड़े होते हैं. इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद क्षेत्र का कासमंडी इलाका कुछ ऐसे ही विवाद की वजह से चर्चा में है. यहां एक पुराने किले, मस्जिद और कब्रिस्तान को लेकर दो पक्ष आमने-सामने हैं. एक पक्ष का दावा है कि यह स्थल महाराजा कंस पासी के ऐतिहासिक किले और पूजा स्थल का हिस्सा था, जबकि दूसरा पक्ष इसे वर्षों पुरानी मस्जिद और धार्मिक स्थल बता रहा है. मामला अब प्रशासनिक स्तर तक पहुंच चुका है और हर कोई इस विवाद की असली कहानी जानना चाहता है.

महाराजा कंस पासी से जुड़ा होने का दावा

कासमंडी क्षेत्र को लेकर पासी समाज का कहना है कि इस इलाके का इतिहास महाराजा कंस पासी से जुड़ा हुआ है. समाज का दावा है कि यह स्थान कभी उनके शासन का प्रमुख केंद्र था और यहां एक विशाल किला मौजूद था. 11वीं शताब्दी के आसपास काकोरी और आसपास के इलाकों में महाराजा कंस पासी का शासन था. स्थानीय परंपराओं, लोककथाओं और पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए यह भी कहा जाता है कि इस स्थान पर धार्मिक गतिविधियां होती थीं और यहां पूजा-पाठ का विशेष महत्व था. समाज का आरोप है कि समय के साथ इस ऐतिहासिक स्थल पर अतिक्रमण हुआ और बाद में यहां मस्जिद तथा कब्रिस्तान विकसित हो गए.

कौन थे महाराजा कंस पासी?

पासी समाज की मान्यता के अनुसार महाराजा कंस पासी अवध क्षेत्र के प्रभावशाली शासकों में गिने जाते थे. माना जाता है कि उनका शासन लगभग वर्ष 980 से 1031 तक अवध क्षेत्र में रहा. उनका प्रभाव मलिहाबाद, काकोरी, उन्नाव, संडीला और हरदोई तक फैला हुआ था. लोककथाओं में उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर मुकाबला किया. यही कारण है कि समाज आज भी उन्हें अपने गौरव और शौर्य के प्रतीक के रूप में देखता है.

मुस्लिम पक्ष ने दावों को किया खारिज

दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इन सभी दावों को पूरी तरह खारिज करता है. उनका कहना है कि यह स्थान लंबे समय से मस्जिद और कब्रिस्तान के रूप में उपयोग में रहा है और यहां वर्षों से नियमित रूप से नमाज अदा की जाती रही है. उनका मानना है कि इस स्थल का धार्मिक स्वरूप नया नहीं है, बल्कि यह कई पीढ़ियों से चला आ रहा है. इसलिए इसे किसी दूसरे ऐतिहासिक दावे से जोड़ना उचित नहीं है.

 इतिहास और आस्था के बीच क्यों बढ़ा विवाद?

यही अलग-अलग दावे इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह बने हुए हैं. एक पक्ष ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान की बात कर रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे अपने धार्मिक अधिकारों से जुड़ा मामला मान रहा है. दोनों अपने-अपने पक्ष में इतिहास, स्थानीय मान्यताओं और उपलब्ध दस्तावेजों का सहारा ले रहे हैं. ऐसे में विवाद केवल जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह इतिहास और आस्था के सवालों से भी जुड़ गया है.

 अब प्रशासन की नजर, जांच के बाद ही साफ होगी तस्वीर

फिलहाल यह मामला प्रशासन और सरकार के संज्ञान में है. ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात निष्पक्ष जांच और ऐतिहासिक तथ्यों का वैज्ञानिक परीक्षण माना जाता है. इतिहास से जुड़े विवाद अक्सर संवेदनशील होते हैं और छोटी-सी चूक भी सामाजिक तनाव का कारण बन सकती है. इसलिए जरूरी है कि सभी दावों की जांच प्रमाणों के आधार पर हो और कानून व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए. तभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना संभव होगा और क्षेत्र में शांति तथा सौहार्द बनाए रखा जा सकेगा.

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