Malaviya Jayanti: यूं ही नहीं कोई महामना बन जाता, कड़े संघर्ष के बाद की थी BHU की स्थापना, पढ़ें
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 25 Dec 2022 6:40 AM
मालवीय जी ने यहां के 900 घरों, 7 हजार पेड़ों और कुछ खेती वाली जमीन का अधिग्रहण कराया था. सरकारी दर के साथ पूरी जमीन खरीदी गई थी. 17 नवंबर, 1916 को यूनाइटेड प्रॉविंस के सचिव एसपी ओ-डॉनेल ने एक आदेश दिया था.
Varanasi: आज से एक शताब्दी पूर्व जब देश में उच्च शिक्षा को लेकर बेहतर इंतजाम नहीं थे और भारतीय मूल्यों के साथ सुविधाजनक तरीके से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बारे में सोचना भी स्वप्न जैसा था, तब महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश में एक ऐसे विश्वविद्यालय की नींव रखी, जो प्राचीन भारतीय परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए देश-दुनिया में हो रही तकनीक की प्रगति की शिक्षा भी दे सके. महामना की 25 जनवरी को जयंती के मौके पर न सिर्फ बीएचयू बल्कि पूरा देश और यहां से शिक्षा ग्रहण करके निकलने वाले छात्र उनको नमन कर रहे हैं.
शिक्षा के उच्च मंदिर की अपनी सोच को साकार करने के लिए महामना ने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना की. सबसे अहम बात है कि इस महान विश्वविद्यालय की स्थापना का काम चंदे से किया गया. इतने भव्य विश्वविद्यालय की स्थापना ही जहां अकल्पनीय कार्य था, वहां महामना ने इसे चंदे से पूर्ण कराकर देश में शिक्षा की अलख जगाने का कार्य किया. सही मायनों में बीएचयू की स्थापना कर मदन मोहन हर भारतीय के महामना बन गए.
बीएचयू का नाम देश के उन संस्थानों में लिया जाता है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. 106 साल पुरानी इस यूनिवर्सिटी में आज भी दाखिला पाने के लिए लाखों की संख्या में उम्मीदवार प्रवेश परीक्षा में शामिल होते हैं. महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है. 1916 में वसंत पंचमी के दिन ही महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने विश्वविद्यालय की नींव रखी थी.
बीएचयू की स्थापना को लेकर कहा जाता है कि मालवीय जी को काशी नरेश ने दान में यह जमीन दी थी. काशी नरेश ने शर्त दी थी कि सूर्यास्त से पहले जितनी जमीन पैदल चलकर वह नाप लेंगे, उतना भूखंड उन्हें दे दिया जाएगा. हालांकि बीएचयू स्थित मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में बने महामना अभिलेखागार में भू अधिग्रहण से जुड़े सारे रिकॉर्ड्स कुछ और सच्चाई उजागर करते हैं.
महामना अभिलेखागार के संयोजक और इतिहास विभाग के डॉ. ध्रुव कुमार सिंह और उनकी टीम ने इन अमूल्य दस्तावेजों को खोजकर सामने रखा है. इसके मुताबिक मालवीय जी ने यहां के 900 घरों, 7 हजार पेड़ों और कुछ खेती वाली जमीन का अधिग्रहण कराया था. सरकारी दर के साथ पूरी जमीन खरीदी गई थी. 17 नवंबर, 1916 को यूनाइटेड प्रॉविंस के सचिव एसपी ओ-डॉनेल ने एक आदेश दिया था. उन्होंने काशी के कलेक्टर से 8 गांवों का जिक्र किया है. इसमें कुल 1164 एकड़ 1 हेक्टेयर और 21 एयर जमीन का अधिग्रहण करने की बात थी.
जमीन अधिग्रहण के दौरान पंडित मदन मोहन मालवीय ने सभी छोटे-बड़े मंदिरों को जस का तस छोड़ दिया. आज इन मंदिरों की देखरेख स्थानीय लोग ही करते हैं. मालवीय जी ने जिनकी जमीनें ली थीं, पहले उन परिवारों को बीएचयू में नौकरी दी. आज भी उनके परिवार के लोग बीएचयू में किसी न किसी पद पर कार्यरत हैं.
बीएचयू की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय शिक्षा का एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मंदिर है. पंडित मदन मोहन मालवीय , डॉ. एनी बेसेंट और डॉ. एस राधाकृष्णन् जैसे महान लोगों के संघर्ष की वजह से इतना बड़ा शिक्षा का केंद्र स्थापित हो पाया.
बीएचयू में 8 संस्थान, 15 संकाय और 146 विभाग हैं. 75 छात्रावास और 35 हजार विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय को एशिया का दिग्ग्ज विश्वविद्यालय बनाते हैं. विश्वविद्यालय में आयुर्वेदिक (चिकित्सा), वैदिक, कृषि, भाषा, विज्ञान, अर्थशास्त्र, ललित कला महाविद्यालय जैसे विभाग शामिल है. यहां विश्व के 34 देशों से छात्र आकर पढ़ते हैं.
विश्वविद्यालय को ‘राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान’ का दर्जा प्राप्त है. डॉ. सुंदरलाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एस राधाकृष्णन, डॉ. अमरनाथ झा, आचार्य नरेन्द्र देव और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. त्रिगुण सेन जैसे विद्वान इस विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं. ख्याति प्राप्त भारतीय वैज्ञानिक शांतिस्वरूप भटनागर ने इस विश्वविद्यालय के कुल गीत ‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर यह सर्व विद्या की राजधानी’ की रचना की थी.
बीएचयू निर्माण के दौरान मदन मोहन मालवीय का एक किस्सा बड़ा मशहूर है. मालवीय जी हैदराबाद के निजाम के पास आर्थिक मदद के लिए गए थे. हैदराबाद के निजाम ने उनसे अभद्रता करते हुए कहा कि दान में देने के लिए उनके पास सिर्फ जूती है. इस पर मालवीय जी निजाम की जूती ही उठाकर ले गए और बाजार में उसे नीलाम करने की कोशिश में लग गए. इससे शर्मिंदा होकर निजाम ने मदन मोहन मालवीय को बुलाकर उन्हें भारी भरकम धनराशि देकर विदा किया.
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हिन्दू शास्त्र तथा संस्कृत भाषा के अध्ययन की वृद्धि, जिसके द्वारा भारतवर्ष की प्राचीन सभ्यता में जो कुछ भी श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण था, उसकी तथा हिन्दुओं की प्राचीन संस्कृति तथा भावनाओं की रक्षा हो सके.
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कला और विज्ञान की सर्वतोमुखी शिक्षा तथा अन्वेषण की वृद्धि.
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आवश्यक प्रयोगात्मक ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान, शिल्पादि कला, कौशल तथा व्यवसाय संबंधी ऐसे ज्ञान की वृद्धि, जिससे स्वदेशी व्यवसाय तथा धंधों की उन्नति हो.
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धर्म और नीति को शिक्षा का आवश्यक या अभिन्न अंग मानकर युवकों में सदाचार का संगठन या चरित्र निर्माण का विकास करना.
यह मेरी इच्छा और प्रार्थना है कि प्रकाश और जीवन का यह केन्द्र जो अस्तित्व में आ रहा है, वह ऐसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के न केवल बराबर होंगे, बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे. अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति ईमानदार रहेंगे.
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