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बसपा विधायकों की बगावत नाकाम, विपक्ष में बिखराव

Updated at : 29 Oct 2020 9:11 PM (IST)
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बसपा विधायकों की बगावत नाकाम, विपक्ष में बिखराव

राज्यसभा चुनाव में सपा की शह पर बसपा में हुई बगावत चुनावी नतीजों पर असर नहीं डाल पाएगा. भाजपा ने 25 अतिरिक्त विधायक होने के बाद भी नौंवा प्रत्याशी खड़ा नहीं कर बसपा को वाकओवर दे दिया.

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राज्यसभा चुनाव में सपा की शह पर बसपा में हुई बगावत चुनावी नतीजों पर असर नहीं डाल पाएगा. भाजपा ने 25 अतिरिक्त विधायक होने के बाद भी नौंवा प्रत्याशी खड़ा नहीं कर बसपा को वाकओवर दे दिया.

इसमें बसपा के छह विधायकों की बगावत से सपा ने रोड़े अटकाने की कोशिश की लेकिन रणनीति सफल नहीं हो पाई. विपक्ष में बिखराव कराने की भजपा की रणनित सफल रही. राज्यसभा चुनाव से अगामी विधानसभा चुनाव के लिए बिसात बिछाई गई जिसमें 2022 में भाजपा को संयुक्त विपक्ष की चुनौती नहीं मिल सकेगी .

निर्वाचन आयोग ने बसपा के बागी विधायकों को तगड़ा झटका दे दिया. अब बसपा प्रत्याशी का राज्यसभा पहुंचना तय हो गया है. बसपा की बगावत से जिस सपा प्रत्याशी को जिताने की कोशिश हो रही थी उनका पर्चा ही रद हो गया. बसपा उम्मीदवार रामजी गौतम के नामांकन पर आपत्तियों को आयोग ने खारिज कर दिया.

भाजपा उम्मीदवार केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी, राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह, पूर्व डीजीपी बृजलाल, नीरज शेखर, हरिद्वार दुबे, गीता शाक्य, सीमा द्विवेदी और बीएल वर्मा. सपा से प्रमुख महासचिव रामगोपाल यादव और बसपा से रामजी गौतम का निर्विरोध चुनाव तय हो गया है. इसकी औपचारिक घोषणा 2 नवम्बर को होगी.

इससे पहले बसपा विधायकों ने उम्मीदवार रामजी गौतम के प्रस्तावक के रूप में अपना नाम वापस लेने की अर्जी पेश तक हड़कंप मचा दिया. लेकिन आयोग ने इसे नहीं माना. नए समीकरण का पहला असर विधानसभा उपचुनाव में नजर आने से इंकार नहीं किया जा सकता है. सामान्य तौर पर राज्यसभा चुनाव की चौसर पर सपा हारकर भी सियासी बाजी जीती हुई दिखती है.

ऐसा लगता है कि वह भाजपा और बसपा में सांठगांठ का संदेश देने  में सफल रही है . लेकिन सपा से ज्यादा भाजपा अपनी रणनीति में सफल रही. भाजपा के रणनीतिकारों के हाथों विपक्ष एक बार फिर सियासी अखाड़े में चारों खाने चित हुआ है.

भाजपा के इस दांव ने 2022 के चुनाव में  विपक्षी एकता की रही सही संभावनाओं के लिए भी संकट खड़ा कर दिया. आमतौर पर आक्रमक राजनीति के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा ने इस बार सुरक्षात्मक  सियासी खेल खेला. राज्यसभा की नौ सीटें जीतने की क्षमता होने के बावजूद सिर्फ  आठ उम्मीदवार उतारना उसकी रणनीतिक चाल थी.

विपक्ष को एक सीट के जाल में उलझाकर भाजपा ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया कि उससे निपटने का एलान करने वालों की प्राथमिकता आपस में ही एक-दूसरे से निपटने और निपटाने की है. वह यह साबित करने में भी सफल रही कि विपक्ष के पास कोई सकारात्मक मुद्दा नहीं है सिवाय विरोध के लिए भाजपा का विरोध करने के. बसपा ने सपा पर अनुसूचित जाति के लोगों की तरक्की बर्दाश्त न कर पाने का आरोप लगाकर इसी संदेश को आगे बढ़ाया. सपा की हार को बसपा और भाजपा दोनों मुद्दा बनाएंगी.

Posted By – Pankaj Kumar Pathak

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