अस्पताल पहुंचकर भी दम तोड़ रही हैं जिंदगी

Updated at : 04 Sep 2017 11:14 AM (IST)
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अस्पताल पहुंचकर भी दम तोड़ रही हैं जिंदगी

जिले के सभी 15 सीएचसी बदहाल, कहीं भवन जर्जर तो कहीं कूड़ा का अंबार शौचालयों में गंदगी, बाहर से पानी लाते हैं मरीज, जांच उपकरण भी नदारद चाईबासा : गांव के आसपास ही मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके, इस उद्देश्य से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) का निर्माण सरकार ने किया था. लेकिन, इन सीएचसी […]

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जिले के सभी 15 सीएचसी बदहाल, कहीं भवन जर्जर तो कहीं कूड़ा का अंबार
शौचालयों में गंदगी, बाहर से पानी लाते हैं मरीज, जांच उपकरण भी नदारद
चाईबासा : गांव के आसपास ही मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके, इस उद्देश्य से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) का निर्माण सरकार ने किया था. लेकिन, इन सीएचसी में बुनियादी सुविधाओं, डॉक्टरों की कमी, डॉक्टरों के अस्पताल से गायब रहने की आदत ने पश्चिमी सिंहभूम के सभी सीएचसी को बीमार कर दिया है.
सीएचसी सिर्फ सर्दी, बुखार, खांसी की दवा देने दुकान बनकर रह गयी है. गंभीर मरीज के आते ही रेफर कर दिया जाता है. जिले के सभी 15 सीएचसी में गंदगी का अंबार है. शौचालयों में गंदगी है. दवा का स्टॉक खत्म हो जाने पर दो से तीन दिन तक दवा आने में लग जाते हैं. गांव के आसपास ही समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण मरीजों की बीमारी गंभीर हो जाती है. इलाज के अभाव में अस्पताल आकर भी जिंदगी दम तोड़ रही है.
60 फीसदी गर्भवती की हो रही है प्राथमिक जांच
गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य की प्राथमिक जांच की जवाबदेही व मॉनीटरिंग सीएचसी की है. जिले में महज 60 फीसदी गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच होती है. फिर यहीं से महिलओं का कुपोषित होना शुरू हो जाता है. स्वास्थ्य जांच नहीं होने के कारण गर्भवती मां में क्या कमी है, इसकी पहचान नहीं हो पाती है. नतीजा यह होता है कि मां और बच्चे दोनों कुपोषित हो जाते हैं.
70 फीसदी ही हो रहा है संस्थागत प्रसव
संस्थागत प्रसव की जिम्मेवारी भी सीएचसी पर ही है. इसके बावजूद जिले में अभी 70 फीसदी ही संस्थागत प्रसव हो रहा है. 30 फीसदी प्रसव घर में ही हो रहे हैं. संस्थागत प्रसव नहीं होने के कारण मां और बच्चे को उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है. इस कारण भी मां और बच्चे दोनों कमजोर होकर विभिन्न बीमारियों के शिकार हो जा रहे हैं.
चक्रधरपुर सीएचसी पर लगभग 2.35 लाख की आबादी को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने की जिम्मेवारी है. डॉक्टरों की कमी व जांच उपकरण नहीं होने के कारण चक्रधरपुर सीएचसी अब सिर्फ सर्दी, बुखार, खांसी की दवा देने के लिए ही जाना जाता है. 30 बेड वाला इस अस्पताल के सभी बेड खाली रहते हैं. बुनियादी सुविधाएं नहीं रहने तथा चिकित्सकों की लापरवाही के कारण मरीजों को सीधे रेफर कर दिया जाता है.
अनुमंडल अस्पताल को ही सीएचसी का दर्जा प्राप्त है. अनुमंडल अस्तपाल के छोटे-छोटे कमरे वाले बेड पर काफी बदइंतजामी से मरीजों का इलाज चल रहा है. ब्लड, टीबी, मलेरिया को छोड़कर कोई भी जांच उपलब्ध नहीं है. एक्स-रे मशीन खराब है. बाजार से मरीजों को एक्स-रे कराना पड़ रहा है.
डॉक्टरों के अभाव से कार्य हो रहा है बाधित : डॉ आरएन सोरेन
अनुमंडल अस्पताल के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ आरएन सोरेन ने कहा कि जहां 11 डॉक्टर समेत दो मेडिकल ऑफिसर की आवश्यकता है. डॉक्टर व कर्मचारियों के लिए कई बार विभाग को पत्र लिखा गया. लेकिन किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई. अस्पताल भवन नहीं होने के कारण मरीजों को सुविधा नहीं मिल रही है.
मरीजों ने खोली अस्पताल में चिकित्सा व्यवस्था की पोल
अनुमंडल अस्पताल में भर्ती मरीज लोटापहाड़ निवासी चंदन कालिंदी पीलिया रोग से पीड़ित हैं. चंदन ने बताया कि दवा बाहर से खरीदकर लाना पड़ रहा है. डोमरा गांव निवासी टीबी मरीज मंगल सिंह गागराई ने कहा कि दो दिन से अस्पताल में भर्ती हैं. जांच रिपोर्ट तक नहीं दी गयी.
इलाज भी नजरअंदाज कर किया जा रहा है. गर्भवती महिला अनीता गुप्ता व शमा परवीन ने कहा कि अस्पताल में इलाज के नाम पर कुछ भी सुविधा नहीं है. साफ सफाई तो बिलकुल नहीं है. एक कमरे में गर्भवती महिलाओं को भेड़ बकरी की तरह रख कर इलाज किया जा रहा है. इस अस्पताल की जो स्थिति है मरीज ठीक होने के बजाय और बीमार हो जायेंगे.
मामला तूल पकड़ने पर लगता है स्वास्थ्य शिविर समुदाय के साथ नहीं होती है बैठक
सीएचसी पर विभिन्न स्थानों में शिविर लगाकर इलाज करने की भी जवाबदेही है. लेकिन, जिले के किसी भी सीएचसी की ओर से शिविर लगाकर लोगों के स्वास्थ्य की जांच नहीं की जाती है. कभी-कभी अधिक संख्या में लोगों के बीमार होने तथा मामला तूल पकड़ने पर स्वास्थ्य शिविर लगाया जाता है.
स्वास्थ्य शिविर नहीं लगाने की यह गड़बड़ी डीसी ने हाल में हुए स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में पकड़ी थी. सामुदायिक के साथ बैठक नहीं करने के मामला भी डीसी की बैठक में उठा था. डीसी ने समुदाय के साथ बैठक नहीं करने पर डॉक्टरों की क्लास लगायी थी.
सीएचसी मुख्यालय में नहीं रहते हैं डॉक्टर, गायब रहती है नर्स
सीएचसी से अक्सर डॉक्टर गायब रहते हैं. वरीय अधिकारियों के हर बार के निरीक्षण में डॉक्टरों के गायब रहने की पुष्टि होते रहती है. नर्स भी सीएचसी में ड्यूटी के दौरान गायब रहती हैं. बार-बार आदेश के बावजूद डॉक्टरों व नर्सों के गायब रहने का यह सिलसिला थम नहीं रहा है.
पांच साल में जर्जर हुआ स्वास्थ्य केंद्र भवन, शौचालय बना कबाड़ खाना, घर से बेडशीट लाते हैं मरीज
2013 में मनोहरपुर सीएसची भवन का निर्माण हुआ था. पांच साल के अंदर ही भवन जर्जर हो गया. मेल वार्ड का बाथरूम कबाड़खाना हो गया है. बाथरूम में सामान रखा जाता है. जलनिकासी की सुविधा नहीं होने के कारण सभी स्वास्थ्य शौचालय की स्थिति बदतर हो गयी है. उपरी तल्ले से पानी टपकने भी शिकायत भी आने लगी है. मरीजों को बेडशीट नहीं दिया जाता है. मरीज अपने घर से बेडशीट लाते हैं.
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