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सोना बुरु जंगल प्रोड्यूसर कंपनी ने पहले ही माह किया ₹7.5 लाख का कारोबार

Updated at : 08 Jun 2025 10:32 PM (IST)
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सोना बुरु जंगल प्रोड्यूसर कंपनी ने पहले ही माह किया ₹7.5 लाख का कारोबार

आदिवासी बाहुल्य ज़िला सिमडेगा में विकसित भारत और आत्मनिर्भर झारखंड की एक नयी और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आयी है.

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प्रतिनिधि, सिमडेगा आदिवासी बाहुल्य ज़िला सिमडेगा में विकसित भारत और आत्मनिर्भर झारखंड की एक नयी और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आयी है. महिलाओं द्वारा संचालित एक सामुदायिक वन-आधारित उद्यम, सोना बुरु जंगल प्रोड्यूसर कंपनी, ने अपने पहले ही साल में बीज व्यापार में शानदार सफलता हासिल की है. कंपनी ने 24.5 मीट्रिक टन साल बीज की पहली खेप एएके इंडिया को भेजकर ₹7.5 लाख का कारोबार किया है. यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि इस कंपनी का गठन मात्र एक महीने पहले हुआ था. यह सफलता इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस (ISB) के फ्लैगशिप कार्यक्रम सुलभा के तहत की गयी पहल का परिणाम है. इस कार्यक्रम के तहत कंपनी का पंजीकरण, जीएसटी अनुपालन, बैंक खाता संचालन और महिला निदेशकों के लिए वित्तीय साक्षरता व व्यावसायिक प्रशिक्षण के पहले चरण को सफलतापूर्वक पूरा किया गया. आइएसबी द्वारा डिज़ाइन किये गये पाठ्यक्रम के तहत आगे भी क्षमता विकास प्रशिक्षण आयोजित किये जायेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में सिमडेगा जिला प्रशासन का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा है. सामुदायिक भागीदारी और वन संरक्षण सोना बुरु जंगल प्रोड्यूसर कंपनी की निदेशक मंडल और सभी शेयरधारक महिलाएं हैं, जो स्वयं जंगल से साल बीज और अन्य लघु वन उपज एकत्र कर बाजार में बेचती हैं. इस व्यापार मॉडल की एक खास बात यह भी रही कि इसमें ग्राम सभा द्वारा गठित सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियों की सक्रिय भागीदारी रही. इससे आय का कुछ प्रतिशत ग्राम सभा को रॉयल्टी के रूप में भी दिया जायेगा. यह रॉयल्टी की राशि सीधे ग्राम सभा के बैंक खातों में स्थानांतरित की जायेगी और इसका उपयोग वनों के संरक्षण व प्रबंधन में किया जा सकेगा. यह स्थानीय स्वशासन को आर्थिक रूप से सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. भविष्य की योजनाएं और दूरगामी परिणाम सोना बुरु जंगल प्रोड्यूसर कंपनी की अध्यक्ष सुबर्दानी लुगुन ने कहा, यह तो सिर्फ एक शुरुआत है. हमारा उद्देश्य है कि सिमडेगा के लघु वन उपज को सही बाज़ार दिलाया जाये, ताकि जो उत्पाद आज भी अनौपचारिक रूप से बिकते हैं और जिनका सही मूल्य लोगों को नहीं मिलता. उन्हें हम औपचारिक आपूर्ति शृंखला के ज़रिये उद्योगों तक पहुंचा सके. इससे हम आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगे और वन संरक्षण की दिशा में भी एक सशक्त कदम बढ़ायेंगे. इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस के एसोसिएट प्रोफेसर एवं कार्यकारी निदेशक, भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, अश्विनी छात्रे ने इस पहल को केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि झारखंड में वन आधारित उद्यमशीलता के नए युग की शुरुआत बताया है। उन्होंने कहा कि यह पहल झारखंड में समुदाय-आधारित सतत वन अर्थव्यवस्था को सशक्त करने की दिशा में एक मॉडल बनकर उभरी है, जिसके सकारात्मक और दूरगामी परिणाम हमारी जैव विविधता और प्राकृतिक संपन्नता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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