आस्था का केंद्र है रामरेखाधाम

Updated at : 21 Feb 2016 11:43 PM (IST)
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आस्था का केंद्र है रामरेखाधाम

रविकांत साहू सिमडेगा : दक्षिणी छोटानागपुर का प्रसिद्ध तीर्थ व पर्यटन स्थल रामरेखाधाम सिमडेगा से पश्चिम हरे-भरे जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर बसा है. आस्था का केंद्र बने रामरेखाधाम में माघ पूर्णिमा के अवसर पर लगनेवाले मेले में भक्तों की भीड़ उमड़ती है. रामरेखाधाम मेले में बिहार, ओडिशा व छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड […]

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रविकांत साहू
सिमडेगा : दक्षिणी छोटानागपुर का प्रसिद्ध तीर्थ व पर्यटन स्थल रामरेखाधाम सिमडेगा से पश्चिम हरे-भरे जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर बसा है. आस्था का केंद्र बने रामरेखाधाम में माघ पूर्णिमा के अवसर पर लगनेवाले मेले में भक्तों की भीड़ उमड़ती है.
रामरेखाधाम मेले में बिहार, ओडिशा व छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड के कोने-कोने से लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं.
रामरेखाधाम की प्राकृतिक छटा लोगों का मन मोह लेती है़. मंदिर परिसर स्थित गुफा व मंदिर में प्रवेश करने से सुकून व शांति मिलती है़. मान्यता है कि मंदिर में पूजा-अर्चना करने से हर मन्नत पूरी होती है़ माघ पूर्णिमा के अवसर पर लगनेवाले तीन दिवसीय मेले में लोगों को हुजूम उमड़ता है़
श्रद्धा का केंद्र
रामरेखाधाम में आस्था का केंद्र पहाड़ की चोटी पर स्थित धनुषाकार स्नान कुंड, सीता चौका, अग्नि कुंड, मुनी गुफा, आकाश गंगा, पंचमुखी बजरंग बली की प्रतिमा व बाबा की समाधि स्थल है़. अहले सुबह पहाड़ की चोटी पर स्थित धनुषाकार कुंड में स्नान कर भगवान के दर्शन के लिए कतारबद्ध तरीके से श्रद्धालु जाते है़ं.
कैसे जायें रामरेखाधाम
कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर रामरेखाधाम जाने के लिए श्रद्धालुओं के लिए सरल मार्ग है़. रांची की ओर से बस से आने वाले श्रद्धालु सिमडेगा बस स्टैंड में उतर जायें. राउरकेला की ओर से आने वाले श्रद्धालु भी सिमडेगा बस स्टैंड में उतर जायें़ बस स्टैंड से छोटी-बड़ी गाड़ियां रामरेखाधाम तक जाती है़
राउरकेला व रांची की ओर से निजी वाहन से आने वाले श्रद्धालु सिमडेगा झूलन सिंह चौंक से पश्चिम कुरडेग रोड होते हुए कोचेडेगा तक जायें. कोचेडेगा से बायें रामरेखा पथ पर चल कर श्रद्धालु सीधे रामरेखा धाम पहुंच सकते हैं
राजा हरिराम सिंह देव ने की थी रामरेखाधाम की खोज
कहा जाता है कि बीरू राजा हरिराम सिंह देव सैर करते हुए घनघोर जंगल के बीच स्थित प्रचीन गुफा के पास पहुंचे. गुफा को देख उन्हें अंदर जाने की उत्सुकता हुई. पत्थर से गुफा का द्वार ढंका हुआ था़.
राजा हरिराम सिंह देव लकड़ी की सीढ़ी बना कर गुफा के अंदर प्रवेश कर गये़ कुछ दूर पर ही एक शिवलिंग मिला़. राजा ने शिवलिंग की पूजा की़. इसके बाद आगे बढ़े. गुफा के अंदर एक काला रंग का शंख मिला़, जिसे उठाने पर उसमें से रामनाम की धुन सुनाई दे रही थी़. इस बात की जानकारी राजा ने गांव के लोगों को दी़. इसके बाद से वहां पूजा-अर्चना शुरू हो गयी़.
यहां पड़े थे भगवान श्रीराम के चरण रज
श्रीराम के चरण पड़ने से ही यहां का नाम रामरेखाधाम पड़ा़ वनवास के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, सीता व लक्ष्मण के साथ यहां पधारे थ़े. यहां उन्होेंने पूजा-अर्चना की थी़ कहा जाता है कि पूजा-अर्चना के समय गुफा का उपरी भाग सिर में सट रहा था़. श्रीराम ने धनुष से मंदिर के अंदर गुफा के उपरी हिस्से में एक लंबी लकीर खींच दी़. श्रीराम द्वारा मंदिर के अंदर गुफा के उपरी हिस्से में खींची गयी रेखा के कारण धाम का नाम रामरेखा धाम पड़ा. मंदिर के अंदर गुफा के उपरी हिस्से में आज भी रेखा को देखा जा सकता है़.
तीन दिवसीय धार्मिक मेला शुरू
रामरेखाधाम में माघ पर्णिमा के शुभ अवसर पर 21 फरवरी से तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत हो गयी. आज शाम 7 बजे से सत्संग, 8 बजे से अधिवास कार्यक्रम का आयोजन किया गया.
रात को धार्मिक फिल्म दिखायी गयी़ 22 फरवरी को सुबह से अखंड हरिकीर्तन की शुरुआत होगी. शाम को संत सम्मेलन व रात में नागपुरी गीत संगीत का कार्यक्रम होगा़ 23 फरवरी को अखंड हरिकीर्तन की पुर्णाहूति के बाद भंडारा का आयोजन किया गया है. पूजा- अर्चन के लिए वाराणसी से पुरोहित काशी दास जी, नारायण दास जी व भोला दास जी का आगमन हो चुका है.
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