350 साल पुरानी परंपरा फिर लौटेगी, सरायकेला में रथयात्रा की तैयारियां पूरी, जानें इस बार क्या होगा खास

Author Sachindra Dash|Edited by Amitabh Kumar
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सरायकेला की रथयात्रा: 350 साल पुरानी परंपरा फिर लौटेगी

सरायकेला-खरसावां जिले में 350 साल से अधिक पुरानी श्री जगन्नाथ रथयात्रा का भव्य आयोजन होने वाला है. सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन करते हुए, भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे. यह उत्सव आस्था, समरसता और लोक संस्कृति का संगम है.

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सरायकेला: सरायकेला-खरसावां जिले में गुरुवार को भगवान श्रीजगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा पूरे धार्मिक उल्लास, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निकलेगी. सदियों से चली आ रही परंपरा के तहत भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी स्थित गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे. जिले के सरायकेला, खरसावां, हरिभंजा, चांडिल समेत अन्य कई क्षेत्रों में रथयात्रा को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं. मंदिरों से लेकर रथों को आकर्षक ढंग से सजाया गया है, जबकि श्रद्धालुओं में महाप्रभु के दर्शन और रथ खींचने को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है. धार्मिक मान्यता है कि वर्ष में एक बार जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए श्रीमंदिर से बाहर निकलते हैं और (मौसी बाड़ी) गुंडिचा मंदिर तक रथ पर यात्रा करते हैं. यही कारण है कि रथयात्रा को केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के मिलन का महापर्व माना जाता है. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली यह यात्रा आस्था, समरसता और लोक संस्कृति का अनुपम संगम प्रस्तुत करती है. मान्यता है कि रथ यात्रा एक मात्र ऐसा मौका होता है, जब प्रभु भक्तों को दर्शन देने के लिये श्री मंदिर से बाहर निकलते हैं और रथ पर सवार प्रभु जगन्नाथ के दर्शन से मोक्ष की प्राप्ति होती हैं.

शास्त्र व पुराणों में भी स्वीकार किया गया है रथ यात्रा की महत्ता

रथ यात्रा के दौरान आस्था की डोर को खींचने के लिये भक्त पूरे साल का इंतजार करते हैं. मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल के द्वितीया तिथि को आयोजित होने वाली रथ यात्रा की प्रथा प्राचिन काल से चली आ रही है. रथ यात्रा का प्रसंग स्कंदपुराण, पद्मपुराण, पुरुषोत्तम माहात्म्य, बृहद्धागवतामृत में भी वर्णित है. शास्त्रों और पुराणों में भी रथ यात्रा की महत्ता को स्वीकार किया गया है. स्कंद पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि रथ यात्रा में जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा मंदिर तक जाता है, वह सीधे भगवान श्री विष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं. जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा देवी के दर्शन करते उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. रथ यात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर जनता के बीच आते हैं और उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं.

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रथ यात्रा में जीवंत हो जाती है राजवाड़ों की परंपरा

यूं तो ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली रथ यात्रा विश्व विख्यात है. लेकिन सरायकेला-खरसावां की रथयात्रा की अपनी अलग पहचान है. यहां पुरी की तर्ज पर हर रस्म-रिवाज को यहां भी पूरा किया जाता है. ओडिया संस्कृति के विशाल परंपराओं में समाहित किये सरायकेला-खरसावां जिला में 350 साल से भी अधिक समय से रथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है. रथ यात्रा के दौरान सदियों पुरानी परंपरा देखने को मिलती है. रथ यात्रा में न सिर्फ प्रभु के प्रति भक्त की भक्ति दिखती है बल्कि राजवाड़े के समय से चली आ रही समृद्ध उत्कलीय परंपरा भी ताजा हो जाती है. राजवाड़ा काल से चली आ रही छेरा पहंरा की परंपरा आज भी जीवंत है. इस परंपरा के तहत राजा चंदन मिश्रित जल का छिड़काव कर स्वर्ण झाड़ू से रथ मार्ग की सफाई करते हैं. इसी रस्मों को निभाने के बाद ही रथ यात्रा की शुरुआत होती है. साथ ही रथ के आगे भक्तों की टोली भजन कीर्तन करते आगे बढ़ती है. यह संदेश देता है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं.

जिला के अलग-अलग क्षेत्रों में होता है आयोजन

सरायकेला व खरसावां के अलावे खरसावां के हरिभंजा, बंदोलौहर, गालुडीह, दलाईकेला, जोजोकुड़मा, सीनी, चांडिल, रघुनाथपुर व गम्हरिया में भी भक्ति भाव से रथ यात्रा का आयोजन होता है. इस दौरान मुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया गया है.

खरसावां में भी रथ यात्रा के दौरान उत्कलीय परंपरा की झलक

चांडिल में पुरी की तर्ज पर तीन अलग-अलग रथों पर सवार हो कर प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं. भगवान जगन्नाथ नंदिघोष रथ, देवी सुभद्रा का देव दलन व बलभद्र तालध्वज रथ पर सवार हो कर गुंड़िचा मंदिर पहुंचते है. खरसावां में भी राजा-राजवाड़े के समय से रथ यात्रा का आयोजन हो रहा है. खरसावां में रथ यात्रा का सारा खर्च सरकार उठाती है. इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाता है. वहीं, हरिभंजा में जमींदार नर्मदेश्वर सिंहदेव के समय शुरु हुई रथ यात्रा करीब ढ़ाई सौ साल पुरानी है. यहां भी बड़ी संख्या में बाहर से भी लोग रथ यात्रा देखने के लिये पहुंचते हैं. हरिभंजा का भव्य जगन्नाथ मंदिर श्रद्धालुओं के लिये आस्था का केंद्र है. इन स्थानों पर रथ एक ही दिन में मौसीबाड़ी पहुंची है.

सरायकेला में 2 दिनों का सफर तय कर मौसीबाड़ी पहुंचते हैं प्रभु जगन्नाथ

सरायकेला में प्रभु जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ दो दिनों का सफर तय कर मौसीबाड़ी पहुंचते है. रथ यात्रा के पहले दिन रास्ते में ही रात्रि विश्राम करते है. दूसरे शाम को फिर रथ यात्रा निकली है और महाप्रभु गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं. रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर में प्रभु, जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा का भव्य श्रृंगार किया जाता है. रथ यात्रा के दौरान भव्य मेला का भी आयोजन किया जाएगा. बड़ी संख्या में लोग मेला का लुफ्त उठायेंगे. सरायकेला-खरसावां में रथ यात्रा का आयोजन भक्ति भाव के साथ किया जाता है.

भक्ति, संस्कृति और सामाजिक समरसता का महापर्व

रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है. इस दिन जाति, धर्म और वर्ग की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और हजारों श्रद्धालु एक साथ महाप्रभु का रथ खींचते हैं. मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने मात्र से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है. पूरे जिले में अब सभी जगह जय जगन्नाथ का उद्घोष सुनाई पड़ रहा है.

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लेखक के बारे में

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शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।

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