सरफेसी मामलों में देरी पर हाईकोर्ट सख्त, डीसी और सीजेएम को तय समय में आवेदन निपटाने का आदेश
झारखंड हाईकोर्ट की फाइल फोटो.
झारखंड हाईकोर्ट ने सरफेसी कानून, 2002 के तहत लंबित मामलों की सुनवाई में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है. राज्य के उपायुक्तों (डीसी) और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारियों (सीजेएम) को निर्धारित समय सीमा में आवेदनों का निपटारा करने का निर्देश दिया गया है. यह कदम सार्वजनिक धन की शीघ्र वसूली सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है.
रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
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Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने सरफेसी कानून, 2002 के तहत लंबित मामलों की सुनवाई में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य के सभी उपायुक्त (डीसी), जिला दंडाधिकारी (डीएम) और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारियों (सीजेएम) को निर्धारित समय सीमा में लंबित आवेदनों का निपटारा करने का निर्देश दिया है. न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने कहा कि सरफेसी कानून का उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों को डिफॉल्टरों की गिरवी संपत्ति पर शीघ्र कब्जा दिलाकर सार्वजनिक धन की वसूली सुनिश्चित करना है. ऐसे में महीनों तक आवेदन लंबित रखना कानून की मंशा के विपरीत है.
कई बैंकों ने लगाई थी हाईकोर्ट की शरण
झारखंड ग्रामीण बैंक, केनरा बैंक, यूको बैंक, एचडीएफसी बैंक, जना स्मॉल फाइनेंस बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों ने अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर कर शिकायत की थी कि सरफेसी कानून की धारा 14 के तहत जिला प्रशासन के समक्ष दिए गए आवेदन लंबे समय से लंबित हैं. इससे गिरवी रखी गई संपत्तियों पर भौतिक कब्जा लेने और बकाया ऋण की वसूली में बाधा उत्पन्न हो रही है.
पांच जिलों में सबसे अधिक लंबित मामले
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य के सभी जिलों से रिपोर्ट मंगाई. रिपोर्ट में सामने आया कि रांची में 146, बोकारो में 65, हजारीबाग में 64, धनबाद में 308 और पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) में 203 आवेदन लंबित हैं. वहीं, जमशेदपुर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष 59 तथा धनबाद सीजेएम कोर्ट में 24 आवेदन लंबित पाए गए. अदालत ने इन आंकड़ों को "चिंताजनक" बताया.
डीएम और सीजेएम की क्या है भूमिका
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरफेसी कानून की धारा 14 के तहत जिला दंडाधिकारी और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की भूमिका केवल बैंक को गिरवी संपत्ति का कब्जा दिलाने में प्रशासनिक सहायता देने की है. उन्हें संपत्ति के स्वामित्व, हस्तांतरण की वैधता या अन्य विवादों पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं है. यह कार्य पूरी तरह "मिनिस्ट्रियल" प्रकृति का है, न कि न्यायिक या अर्ध-न्यायिक.
सीएनटी कानून का हवाला देकर देरी नहीं होगी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम के तहत आदिवासी भूमि के संरक्षण से जुड़े पहलुओं की जांच में समय लगता है. इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि सरफेसी कानून और सीएनटी एक्ट अलग-अलग कानून हैं. धारा 14 के तहत कार्य करते समय डीसी को सीएनटी एक्ट के तहत उपलब्ध अधिकारों का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है. इसलिए इस आधार पर आवेदनों को लंबित नहीं रखा जा सकता.
समयबद्ध निपटारे के लिए तय की समय सीमा
अदालत ने रांची के उपायुक्त को छह सप्ताह, धनबाद और पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्तों को आठ सप्ताह तथा हजारीबाग और बोकारो के उपायुक्तों को चार सप्ताह के भीतर लंबित मामलों का निपटारा करने का निर्देश दिया. अन्य सभी जिलों के उपायुक्तों को तीन सप्ताह के भीतर लंबित आवेदन निपटाने का आदेश दिया गया. वहीं, जमशेदपुर के सीजेएम को 60 दिन, धनबाद के सीजेएम को 30 दिन और अन्य जिलों के सीजेएम को 15 दिनों के भीतर लंबित मामलों का निपटारा करने का निर्देश दिया गया.
अलग रजिस्टर रखने और पारदर्शिता के निर्देश
हाईकोर्ट ने भविष्य में देरी रोकने के लिए सभी जिला दंडाधिकारियों और मुख्य न्यायिक दंडाधिकारियों को सरफेसी कानून के आवेदनों के लिए अलग रजिस्टर बनाए रखने का निर्देश दिया है. इसमें आवेदन प्राप्त होने की तिथि, सुनवाई, आदेश, निष्पादन और लंबित मामलों का पूरा विवरण दर्ज किया जाएगा. अदालत ने कहा कि इस व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी और आवेदनों की नियमित निगरानी संभव होगी.
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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सरफेसी कानून का मूल उद्देश्य सार्वजनिक धन की शीघ्र वसूली है. अदालत ने कहा कि डिफॉल्टरों को अनावश्यक लाभ पहुंचाने वाली देरी कानून की भावना के विपरीत है. इसलिए सभी संबंधित अधिकारियों का दायित्व है कि वे निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए यथाशीघ्र बैंकों को आवश्यक प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराएं.
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