मिट्टी के दीयों से रोशन होगी दीपावली, पर कुम्हारों की उम्मीदें धुंधली

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मिट्टी के दीयों से रोशन होगी दीपावली, पर कुम्हारों की उम्मीदें धुंधली

परंपरागत कुम्हार समाज दिन-रात कर रहा मेहनत, लेकिन नहीं मिल रहा उचित लाभ

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मंडरो

दीपावली पर्व जैसे-जैसे समीप आ रहा है, वैसे-वैसे तैयारियों ने भी रफ्तार पकड़ ली है. मंडरो प्रखंड मुख्यालय एवं मिर्जाचौकी सहित आसपास के क्षेत्रों में कुम्हार समाज के लोग पारंपरिक मिट्टी के दीये, मटकी, गुल्लक व अन्य बर्तन बनाने में पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं. वे आशा करते हैं कि इस वर्ष दीपावली उनके लिए भी रोशनी और खुशियाँ लेकर आएगी. कुम्हार समाज के बबलू पंडित, अमर पंडित और धनेसर पंडित जैसे कारीगरों का मानना है कि मिट्टी के दीपक का धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व होता है. ये दीये पूजा-पाठ एवं पर्व-त्योहारों में पवित्रता का प्रतीक माने जाते हैं. यह कला उनके पूर्वजों से चली आ रही है और आज भी वे उसी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. कुम्हारों द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला चाक पत्थर के कारीगरों द्वारा बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है, वहीं कुछ लोगों के पास अब विद्युतचालित चाक भी है, जिससे श्रम की बचत होती है. चाक पर अंगुलियों के जादू से दीपक, मटका, करवा, गुल्लक आदि आकार लेते हैं.

मुनाफे के बजाय बढ़ रही लागत, मेहनत हो रही बेकार

कुम्हारों का कहना है कि एक माह पूर्व से ही वे मिट्टी एकत्र करने, उसे आकार देने, सुखाने और पकाने की प्रक्रिया में जुट जाते हैं. कई बार दीये टूट जाते हैं या खराब हो जाते हैं. फिर भी मेहनत जारी रहती है. एक व्यक्ति एक दिन में लगभग 100 दीये बनाता है, लेकिन इन्हें केवल 2 रुपये प्रति दीया के हिसाब से ही बेच पाता है. ऐसे में उसे दिनभर की मेहनत के बदले केवल 100 रुपये ही मिल पाते हैं, जो बेहद कम है. इस पारंपरिक कुटीर उद्योग को चलाये रखने हेतु कुम्हार समाज को सरकारी सहायता और प्रोत्साहन की सख्त आवश्यकता है.

प्लास्टिक और चाइनीज उत्पादों से घट रही मिट्टी के बर्तनों की मांग

वर्तमान समय में प्लास्टिक और कांच के सस्ते विकल्पों की अधिकता के कारण मिट्टी के बर्तनों की मांग में भारी गिरावट आयी है. बाजार में चीनी उत्पादों की भरमार और उनकी कम कीमत के चलते लोग पारंपरिक मिट्टी के दीयों की ओर आकर्षित नहीं हो रहे हैं. दीपावली के अवसर पर जहां मिट्टी का दीया दो रुपये में बिक रहा है, वहीं धूपिया 50 रुपये तथा गुल्लक 70 रुपये में बेचे जा रहे हैं. परंतु प्लास्टिक के विकल्पों के सस्ते होने के कारण ग्राहक उन्हीं की ओर रुख कर रहे हैं.

युवाओं का मोहभंग, विलुप्त हो रही परंपरा

कुम्हार समाज की युवा पीढ़ी इस परंपरागत धंधे से दूर होती जा रही है. उनका मानना है कि अत्यधिक मेहनत के बावजूद इसमें लाभ बेहद कम है. आधुनिक शिक्षा, जीवनशैली और तकनीकी साधनों की ओर आकर्षण ने उन्हें इस कला से विमुख कर दिया है. यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में यह पारंपरिक कला पूर्णतः विलुप्त हो सकती है. कुम्हार समाज ने राज्य सरकार से इस पारंपरिक कुटीर उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाओं की मांग की है. यदि इन्हें उचित प्रशिक्षण, कच्चा माल, ऋण सुविधा एवं विपणन सहायता मिले तो यह कला पुनः अपनी चमक बिखेर सकती है.

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Abdhesh Singh

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