ePaper

धन की देवी मां लक्खी को प्रसन्न करने की रात

Updated at : 05 Oct 2025 7:58 PM (IST)
विज्ञापन
sahibganj

साहिबगंज (फाइल फोटो)

बंगाली समाज में घर-घर होती है पूजा

विज्ञापन

साहिबगंज

शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है. उसकी किरणें धरती पर अमृत बरसाती हैं. यह रात धार्मिक, आध्यात्मिक व स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद खास है. इसी वजह से भारतीय सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा को सभी पूर्णिमाओं में श्रेष्ठ माना गया है. यह वो रात है जब चंद्रमा अपनी पूर्ण शक्ति, सौंदर्य व सोलह कलाओं से युक्त होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है. इस साल शरद पूर्णिमा छह अक्टूबर को है. आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. ””””””””कोजागरी”””””””” शब्द का अर्थ ””””””””को जागर्ति ””””””””यानी ””””””””कौन जाग रहा है. मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात को मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं. हर घर के दरवाजे पर जाकर यह देखती हैं कि कौन-कौन भक्त जागरण कर रहा है. जो भक्त जागरण कर मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु की पूजा करते हुए मिलते हैं. उनके घर में देवी प्रवेश करती हैं. यह पर्व मुख्य रूप से बंगाली समाज की ओर से बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है. पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी की उत्पत्ति शरद पूर्णिमा की तिथि पर ही हुई थी. इसीलिए इस दिन को देवी लक्ष्मी के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है. जो भक्त इस रात जागरण करके माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन पर मां की विशेष कृपा होती है और उन्हें धन-धान्य तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. इसीलिए भी इसे कोजागरी पूर्णिमा या फिर लखी पूजा भी कहते हैं.

चांदनी रात में रखी जाती खीर, हो जाती है औषधीय गुण से पूर्ण :

शरद पूर्णिमा की रात आसमान से अमृत की बरसात होती है. मान्यता है कि इस दिन खीर बनाकर उसे खुले आकाश में चन्द्रमा की रोशनी में रखने से उसमें अमृत समान गुण आ जाता है. उस खीर का सेवन दूसरे दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर करने से सभी को कई प्रकार का स्वास्थ्यप्रद लाभ मिलता है. चांदनी में रखी खीर में कई औषधीय गुण उत्पन्न हो जाते हैं. इसका सेवन करने से सांस की बीमारी सहित अन्य प्रकार के रोगों में काफी लाभ मिलता है. इस कारण शरद पूर्णिमा की रात कई लोग खीर बना कर खुले आकाश के नीचे चांद की रोशनी में रखते हैं और फिर उसका सेवन करते हैं.

शरद पूर्णिमा पर खासकर बंगाली समाज के प्रत्येक घर में लखी पूजा का आयोजन भक्तिभाव से किया जाता है. इसे लेकर कई घरों में माता लखी की प्रतिमा भी स्थापित होती है. इसके बाद माता की विधि-विधान से पूजा होती है. माता लक्खी पूजा में कई प्रकार की प्राकृतिक सामग्री की जरूरत होती है. मसलन, धान की बाली, ईख, ताड़ के फल से निकलने वाला खूजा, नारियल आदि विशेष महत्वपूर्ण होता है. इसके अलावा भी कई अन्य सामग्री का पूजन में उपयोग होता है. बंगाली समाज के अलावा कुछ अन्य समाज भी लखी पूजा करते हैं.

कल दोपहर 12.23 बजे प्रवेश करेगी पूर्णिमा :

इस साल शरद पूर्णिमा उत्सव छह अक्टूबर को मनेगा. इसी दिन देर शाम को माता लक्खी की पूजा होगी. बंगाली पुरोहितों के अलावा कई अन्य पुरोहितों के अनुसार, इस साल शरद पूर्णिमा यानि आश्विन पूर्णिमा छह अक्टूबर की दोपहर 12.23 बजे प्रवेश कर दूसरे दिन सात अक्टूबर की सुबह 09.16 बजे तक रहेगा. इस कारण शरद पूर्णिमा छह अक्टूबर को मनेगा. इसी दिन देर शाम को मां लक्खी (लक्ष्मी) की पूजा-अर्चना होगी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
ABDHESH SINGH

लेखक के बारे में

By ABDHESH SINGH

ABDHESH SINGH is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola