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ओके… अब नजर नहीं आता सनपटेरा संवाददाता, साहिबगंजदीपावली की रात उड़ाए जाने वाला सनपटेरा अब ग्रामीण क्षेत्र में लुप्त होने लगा है. आधुनिकता की चकाचौंध में लोग सनपटेरा को भूल गए हैं. साहिबगंज में दीपावली के काफी पहले से ही लोग सनपटेरा बनाने में जुट जाते थे. लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात हो […]
ओके… अब नजर नहीं आता सनपटेरा संवाददाता, साहिबगंजदीपावली की रात उड़ाए जाने वाला सनपटेरा अब ग्रामीण क्षेत्र में लुप्त होने लगा है. आधुनिकता की चकाचौंध में लोग सनपटेरा को भूल गए हैं. साहिबगंज में दीपावली के काफी पहले से ही लोग सनपटेरा बनाने में जुट जाते थे. लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात हो गयी है. इसकी जगह अब इलेक्ट्रॉनिक बल्ब ने ले ली है. सनपटेरा की लंबाई औसतन से पांच से दस फीट होती थी. जिसे खरों और बांस की कमंची से बांधकर रंग बिरंगे कागजों से सजाया जाता था. सनपटेरा के नीचे छोटा सा छेद छोड़ा जाता था ताकि हवा अंडर जा सके. सपपटेरा के भीतर कपड़े में मिट्टी तेल भिंगाकर पलीता बनाकर उसमें आग लगा दिया जाता था. सनपटेरा के भीतर धुआं भरने के बाद सनपटेरा अपने आप आकाश की तरफ उड़ने लगता था.
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