बेवजह खाक छानते दर्दमंदों का कोई मददगार नहीं

साहिबगंज : विज्ञान की माने तो मनोचिकित्सकीय क्षेत्र में किसी भी मानसिक रोगी का इलाज संभव है. अगर समय रहते इलाज करा दिया जाय तो 99 प्रतिशत मामले में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश होती है. मगर शहरवासी अपने में इतने मशगुल हैं कि दूसरों की फिक्र ही नहीं कर पा रहे. एक तो […]
साहिबगंज : विज्ञान की माने तो मनोचिकित्सकीय क्षेत्र में किसी भी मानसिक रोगी का इलाज संभव है. अगर समय रहते इलाज करा दिया जाय तो 99 प्रतिशत मामले में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश होती है. मगर शहरवासी अपने में इतने मशगुल हैं कि दूसरों की फिक्र ही नहीं कर पा रहे. एक तो यहां ना तो ढंग का कोई मनोचिकित्सक है और ना ही यहां बने अस्पताल में डॉक्टर को ही पदस्थापित किया गया है. यहां के संपन्न लोगों को किसी प्रकार की कोई मानसिक परेशानी होती है,
तो वे अपना इलाज बाहर जाकर करा लेते हैं और वे स्वस्थ हो उठते हैं. मगर जरा उनके बारे में सोचिये जिनका कोई नहीं है. या फिर किसी कारणवश घर से निकाल दिये गये हैं, या फिर मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहने की वजह से घर छोड़ कर निकल गये हैं. उनके बारे में कोई सोचने वाला नहीं है. ऐसे ही शहर में तीन विक्षिप्त भटक रहे हैं.
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