World Tribal Day 2020: अगर आप आदिवासियों को बहुत पिछड़ा समझ रहे हैं, तो ये आंकड़े आपको चौंका देंगे

World Tribal Day 2020: विश्व आदिवासी दिवस 2020 पर आपको यह जान लेना जरूरी है कि आदिवासी किस तरह अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के साथ खुद को जोड़ रहे हैं. कितनी तेजी से वे आगे बढ़ रहे हैं. आंकड़ों पर गौर करेंगे, तो आप पायेंगे कि आधुनिकता और तरक्की के कुछ ऐसे भी पैमाने हैं, जहां आने वाले कुछ ही दिनों में सामान्य वर्ग के लोगों से भी आदिवासी आगे निकल जायेंगे.
रांची : आदिवासियों को अगर अभी भी आप बहुत पिछड़ा समझ रहे हैं, तो अपनी सोच को बदलिये. आंकड़ों पर गौर करिये और देखिये कि आदिवासी कितनी तेजी से बदल रहे हैं. गांवों में रहने वाले आदिवासी जरूर पिछड़े हैं, लेकिन शहरी क्षेत्र के निवासी अनुसूचित जनजाति के लोगों ने काफी तरक्की कर ली है. खासकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के मामले में.
विश्व आदिवासी दिवस 2020 पर आपको यह जान लेना जरूरी है कि आदिवासी किस तरह अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के साथ खुद को जोड़ रहे हैं. कितनी तेजी से वे आगे बढ़ रहे हैं. आंकड़ों पर गौर करेंगे, तो आप पायेंगे कि आधुनिकता और तरक्की के कुछ ऐसे भी पैमाने हैं, जहां आने वाले कुछ ही दिनों में सामान्य वर्ग के लोगों से भी आदिवासी आगे निकल जायेंगे.
भारत सरकार की जनगणना 2011 के आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति के 71 फीसदी लोगों के पास टेलीफोन है. यह किसी भी अन्य वर्ग के लोगों से ज्यादा है. शहरों में कुल 70.3 फीसदी घरों में टेलीफोन हैं. इनमें अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के 70.9 फीसदी और सामान्य वर्ग के 70.1 फीसदी लोगों के घरों में फोन है.
चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी आज भी आधुनिक तकनीक और सुख-सुविधाओं से दूर हैं, राष्ट्रीय स्तर पर इनका औसत बहुत अच्छा नहीं दिखता. देश में कुल 57.2 फीसदी घरों में टेलीफोन की सुविधा है. एससी वर्ग के 53.1 फीसदी परिवारों में टेलीफोन है, तो एसटी वर्ग के मात्र 34.8 फीसदी परिवारों के पास यह सुविधा उपलब्ध है.
ग्रामीण क्षेत्रों का आंकड़ा देखने पर आप समझ जायेंगे कि समग्र रूप से राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी इस मामले में पिछड़ कैसे गये. भारत के गांवों में 51.1 फीसदी घरों में टेलीफोन का इस्तेमाल हो रहा है. सबसे ज्यादा 56.1 फीसदी सामान्य वर्ग के घरों में टेलीफोन है, तो एससी कैटेगरी के 47 फीसदी लोगों के घरों में. गांवों में रहने वाले मात्र 29.1 फीसदी आदिवासी परिवारों के पास टेलीफोन है.
कम्प्यूटर और लैपटॉप के मामले में अनुसूचित जनजातियों के लोग बहुत आगे नहीं हैं, लेकिन इस मामले में भी शहरी क्षेत्र में वे सामान्य वर्ग के लोगों को कड़ी टक्कर देने की तैयारी कर चुके हैं. शहरों में कुल मिलाकर 18.7 फीसदी लोगों के घरों में लैपटॉप या कम्प्यूटर का इस्तेमाल होता है.
अनुसूचित जाति के 11.3 फीसदी घरों में लैपटॉप या कम्प्यूटर है. वहीं सामान्य वर्ग के 20.2 फीसदी घरों में लॉपटॉप या कम्प्यूटर का इस्तेमाल हो रहा है. आदिवासी या एसटी समुदाय के 14.2 फीसदी लोग इन उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं. यानी एससी वर्ग से करीब 3 फीसदी अधिक और सामान्य वर्ग के लोगों से मात्र 6 फीसदी कम.
इसी तरह टेलीविजन देखने में भी ये लोग बहुत पीछे नहीं रह गये हैं. जनगणना 2011 के आंकड़े बताते हैं कि देश में 47.2 फीसदी परिवारों के पास टेलीविजन है. एससी वर्ग के 39.1 फीसदी और सामान्य वर्ग के 52.5 फीसदी परिवारों में टेलीविजन उपलब्ध हैं. राष्ट्रीय स्तर पर कुल 21.9 फीसदी आदिवासी परिवारों के घरों में टीवी है.
अब जरा इसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बांटकर देखिए. ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 33.4 फीसदी लोगों के घरों में मनोरंजन का साधन टेलीविजन है. 29.1 फीसदी अनुसूचित जाति और 37.8 फीसदी सामान्य वर्ग के लोगों के घरों में यह उपकरण है. 15.2 फीसदी अनुसूचित जनजाति या आदिवासी परिवारों में ही अब तक टीवी पहुंच सका है.
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शहरी क्षेत्र में भी आदिवासी टीवी देखने में पीछे हैं. शहरों में कुल 76.7 फीसदी परिवारों के पास टीवी है. एससी और सामान्य वर्ग के क्रमश: 68.5 फीसदी और 78.8 फीसदी परिवारों में टीवी पहुंच चुका है. मात्र 64.2 फीसदी आदिवासी परिवारों के पास अब तक ‘बुद्धू बक्सा’ पहुंच सका है.
Posted By : Mithilesh Jha
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By मिथिलेश झा
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