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Ranchi News : एसएनसीयू में नवजात को 24 घंटे ट्रेंड स्टाफ ही देंगे स्वास्थ्य सेवा

नियमित जांच एवं फॉलोअप के लिए लिया गया फैसला

रांची. राज्य के सभी सदर व अन्य प्रसव की उच्चतम सुविधा वाले अस्पतालों में बीमार नवजात बच्चों के स्वास्थ्य लाभ के लिए संचालित स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) और लेबर रूम को बेहतर तरीके से संचालित किया जायेगा. एनएचएम ने इसका निर्देश सभी सिविल सर्जन को दिया है. इसके तहत अस्पताल के फैसिलिटी बेस्ट स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट में तीनों शिफ्ट में प्रशिक्षित चिकित्सक और ट्रेंड स्टाफ नर्स की सेवा ही लगेगी. इसके अलावा कुपोषण उपचार केंद्र में प्रशिक्षण प्राप्त एएनएम की सेवा लगायी जानी है. एसएनसीयू वाले सभी नवजातों को बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करायी जा सके, इसके लिए ड्यूटी रोस्टर को लेकर रणनीति तैयार की गयी है. अब इसी को आधार बनाकर सभी एसएनसीयू और लेबर रूम को बेहतर सुविधाएं दी जानी हैं. साथ ही भर्ती नवजातों के स्वास्थ्य की नियमित जांच एवं फॉलोअप किया जाना है. यहां 24 घंटे नवजात की देखभाल में दक्ष प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ के अलावा शिशु रोग विशेषज्ञ महिला चिकित्सकों की ही तैनाती होगी.

नवजात की 24 से 48 घंटे तक विशेष निगरानी जरूरी

नवजात के रोगग्रस्त होने पर उसे एसएनसीयू में भर्ती कराया जाता है. जहां कम से कम 24 से 48 घंटे तक प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी व चिकित्सकीय देखरेख में बच्चे का रहना जरूरी है. इस दौरान उसकी हालत पर पूरी निगरानी रखी जाती है. एसएनसीयू में रेडियो वॉर्मर, ऑक्सीजन की सुविधा, फोटो थैरेपी जो पीलिया (जांडिस) पीड़ित बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है.

रांची सदर अस्पताल बना मॉडल

रांची सदर अस्पताल के एसएनसीयू में 12 रेडिएंट वार्मर से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है. यहां पिछले महीने 78 नवजात का उपचार हुआ था. हालांकि, कई जगहों पर ट्रेंड स्टाफ के न होने से अव्यवस्था भी सामने आयी है. मालूम हो कि जब बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं, तो उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती है या उनका जन्म मुश्किल होता है, तो उन्हें अस्पताल के एनआइसीयू में ले जाया जाता है.

क्यों पड़ी जरूरत

ग्रामीण क्षेत्रों में सही पोषण का अभाव, कम उम्र में शादी, एनीमिया ग्रसित गर्भवती एवं एएनसी जांच में अनदेखी सहित कई अन्य वजहों से गर्भ में पल रहे शिशु का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता है. जन्म लेनेवाले नवजात के वजन, आकार, हावभाव, हरकत व लक्षण के आधार पर रोगग्रस्त नवजात बच्चों की पहचान की जाती है. बहुत बार प्रसव वार्ड में तैनात चिकित्सक ही नहीं जीएनएम एवं एएनएम भी बाल रोग की पहचान में बेहद दक्ष नहीं होते हैं.

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Prabhat Khabar News Desk
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