Ranchi News : बेटोें के साथ बेटियों को भी निर्णय लेने का अधिकार

Published by :MUNNA KUMAR SINGH
Published at :03 Jul 2025 12:54 AM (IST)
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Ranchi News : बेटोें के साथ बेटियों को भी निर्णय लेने का अधिकार

राजधानी की युवतियों ने इस घटना को निंदनीय बताया है. उनका मानना है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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रांची (पूजा सिंह). राजधानी की युवतियों ने इस घटना को निंदनीय बताया है. उनका मानना है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन, एक बेटी की मनोदशा क्यों इतनी क्रूर हुई, इसे अभिभावकों को समझना चाहिए. कई बार अरेंज मैरिज सामाजिक और पारिवारिक दबाव में किये जाते हैं. बेटियों से उनकी इच्छा नहीं पूछी जाती है. ऐसे में उन बेटियों की मनोदशा को समझना होगा, बेटोें के साथ बेटियों को भी निर्णय लेने का अधिकार है.

सोनम की राजा से अरेंज मैरिज हुई थी, जो की सामान्य है. लेकिन, इसके पीछे सामाजिक और पारिवारिक दबाव काम करता है. बेटियों की मर्जी के बिना शादी करवा दी जाती है. कोई बेटी अपने हक के लिए बोले तो माता-पिता या समाज उनको चुप करा देते है.

निधि यादव, हटिया

जैसे हर दिन एक जैसा नहीं था, वैसे ही हर नारी एक नहीं है. सोनम की बात उनके अभिभावकों ने सुनी होती या उसकी खुशियों के बारे में सोचा होता तो ये नौबत नहीं आती. सोनम ने जो किया गलत है. लेकिन, माता-पिता को चाहिए कि वह अपनी बेटी की मनोदशा को समझें, ताकि दोबारा ऐसी घटना न हो.

अंजली कुमारी, धुर्वा

समाज से पूछना चाहती हूं कि क्या हमें अपने जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं है? अभिभावक को हमसे ज्यादा दुनिया की समझ होती है और वह अपने बच्चों का कभी भी बुरा नहीं चाहेंगे. लेकिन, माता-पिता को भी बेटियों की सोच और उनकी भावनाओं को समझना चाहिए.

पायल उरांव, बेड़ो

सोनम प्रसंग की घटना किसी भी तरह से उचित नहीं है. इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इससे बस स्त्री और पुरुष में आपसी मतभेद उत्पन्न होंगे. हर व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है. मेरा मानना है कि यह सभी बातों का संबंध सीधा व्यक्ति की मनोवृत्ति से है. यह समझने की आवश्यकता है.

एंजेल कुंडलना, चुटिया

कोई भी स्त्री सहज रूप से हिंसक या अपराधी प्रवृत्ति की नहीं होती. यह घटना दर्शाती है कि शायद सोनम किसी गहरे मानसिक तनाव, अपमान या लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा का शिकार रही हो. जब भावनाएं दमित होती हैं और संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तब व्यक्ति गलत राह पर चला जाता है.

रिया छाबड़ा, रांची

किसी महिला के अपराध से पूरे नारी समाज को दोषी ठहरना गलत है. हर महिला की अपनी सोच, परिस्थिति व निर्णय होते हैं. किसी भी घटना को व्यक्तिगत रूप से जांचना चाहिए और समाज को व्यापक सोच अपनानी चाहिए. किसी एक घटना को आधार बनाकर पूरे वर्ग पर टिप्पणी करना अनुचित है.

प्रीति मेहरा, बहू बाजार

एक औरत, जिसे समाज ममता, सहनशीलता और प्रेम का प्रतीक मानता है, उसके अंदर ऐसी क्रूर प्रवृत्ति आयी कैसे? समाज को यह समझना होगा कि हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण, दबाव, या परिस्थिति जरूर होती है. जरूरत है कि हम अपनी बेटियों को, बहनों को और समाज की हर औरत को समझें.

कृति कशिश, रांची

हर किसी का व्यक्तिगत इच्छाओं और पारिवारिक अपेक्षा के बीच संतुलन बनना कितना महत्वपूर्ण हो सकता है. जबरदस्ती या बिना मर्जी के लिये गये बड़े फैसले में गंभीर परिणाम हो सकते है. रिश्तों में पारदर्शीता और खुलकर संवाद कितना आवश्यक है.

प्रियंका खाखा, रांची

सोनम ने जो किया, वह निश्चित ही गलत है. लेकिन, हमें यह समझना होगा कि कोई औरत अचानक हैवान नहीं बनती. उसके पीछे दर्द, घुटन और कई बार वर्षों की उपेक्षा छिपी होती है. समाज सिर्फ उसके अपराध को देख रहा है, लेकिन उस तक पहुंचने वाले कारणों को नजरअंदाज कर रहा है.

दिव्या कुमारी, हिनू

मनोवैज्ञानिक की राय….

तनाव और अकेलापन बड़ी वजह

महिलाएं अब लंबे समय से दबे हुए गुस्से, तनाव, घरेलू हिंसा और सामाजिक असमानता का सामना कर रही हैं. जब ये भावनाएं लंबे समय तक दबी रहती हैं और समाधान नहीं मिलता, तो कभी-कभी ये हिंसक रूप में सामने आती हैं. मानसिक स्वास्थ्य का अभाव, तनाव और अकेलापन भी बड़ी वजह है. महिलाएं आज आत्मनिर्भर हो रही हैं, लेकिन समाज अब भी उन्हें सीमित भूमिका में देखना चाहता है.

डॉ मो सादिक, मनोवैज्ञानिक, सीआइपी

खुलकर बात करना जरूरीमहिलाओं और पुरुषों दोनों हिंसा का शिकार हो रहे हैं. पहले ये मामले कम थे अब ज्यादा होते जा रहे हैं. ज्यादातर समाज में रहने वाले असामाजिक तत्व इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं. डिजिटल एप्लिकेशन, सोशल मीडिया असामाजिक तत्वों को पनपने का पूरा मौका देता है. शायद इसी वजह से महिला अपराध की प्रगति बढ़ रही है. चीजों के रोकने के लिए चीजों के बारे में चिंता होनी चाहिए. यदि कोई महिला किसी तरह का तनाव, गुस्सा या अपनी भावनाओं में कोई भी बदलाव महसूस करती हैं तो मदद जरूर लें.

डॉ भूमिका सच्चर, मनोवैज्ञानिकB

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