कच्चे घरों में रहने को विवश हैं आदिवासी परिवार
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 14 Dec 2024 6:53 PM
मचवाटांड़ के आदिवासी परिवार आवास योजना रहते कच्चे घरों में रहने को विवश हैं. चूरी दक्षिणी पंचायत के मचवाटांड़ में 30 घर आदिवासी परिवार रहते हैं.
चूरी दक्षिणी पंचायत के मचवाटांड़ में 30 आदिवासी परिवारों को नहीं मिला योजना का लाभ
प्रतिनिधि, खलारीमचवाटांड़ के आदिवासी परिवार आवास योजना रहते कच्चे घरों में रहने को विवश हैं. चूरी दक्षिणी पंचायत के मचवाटांड़ में 30 घर आदिवासी परिवार रहते हैं. सभी का घर मिट्टी का है. ज्ञात हो कि प्रखंड में प्रधानमंत्री आवास, अबुआ आवास, आंबेडकर आवास योजना के तहत सैकड़ों लोगों का आवास बना है. अभी हाल ही में झारखंड सरकार द्वारा शुरू की गयी अबुआ आवास योजना के तहत पांच सौ लोग का चयन हुआ. जिसको जरूरत थी आज वह मिट्टी के घर में रहा है. इस योजना के माध्यम से उन्हें छत प्रदान करना है, जो बेघर हैं. यानि वैसे लोग जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हैं और जिनके पास मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं. लोग आज भी इस योजना से वंचित हैं और कच्चे घरों में रह रहे हैं. इसकी वजह से लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
गांव की महिला अनिता देवी ने बताया कि कच्चे घरों में बार-बार लिपाई-पुताई करनी पड़ती है. इस काम में व्यस्तता के कारण लड़कियों की शिक्षा प्रभावित होती है. अगर समय पर लिपाई-पुताई न हो तो घर में सांप या अन्य छोटे विषैले जानवरों के आने का खतरा बना रहता है. बारिश के मौसम में खतरा और भी ज्यादा हो जाता है. गांव की लड़कियां कहती हैं कि हमें कच्चे घर में रहना अच्छा नहीं लगता है, लेकिन आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम पक्के मकानों में रह सकें. बताती हैं कि हमें बार-बार इसकी लिपाई करनी पड़ती है और उसके लिए मिट्टी लेने बहुत दूर जाना पड़ता है.बारिश के दिनों में ज्यादा परेशानी
बारिश के दिनों में हमारे घरों में पानी टपकता रहता है जिससे पूरा जमीन गीला हो जाता है. हम परिवार के लोग किसी प्रकार रात काटते हैं. यदि कभी रात में तेज़ आंधी तूफ़ान और भारी बारिश होती है तो वह हमारे लिए सबसे मुश्किल का समय होता है. उस समय हमारे लिए उस घर का होना और नहीं होना, सब बराबर हो जाता है, क्योंकि बारिश का पूरा पानी घर में बहता रहता है. वहीं गर्मी के दिनों में चलने वाली लू से भी हमारी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो जाती है.क्या कहते हैं गांव के लोग
पंचू मुंडा, मेघु मुंडा, राजेश मुंडा, बलदेव मुंडा ने बताया कि हमारा गांव आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत पिछड़ा हुआ. इस गांव में सभी आदिवासी समाज के लोग ही कच्चे घरों में रहते हैं. इस समाज में साक्षरता की दर भी बहुत कम है. अधिकतर पुरुष दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करते हैं. वहीं महिला साक्षरता की बात करें तो यह चिंताजनक स्थिति में है. ऐसे में इस समाज को अबुआ आवास योजना जैसी महत्वपूर्ण जानकारी का अभाव दिखता है.कोट
अबुआ आवास के लिए गांव के लोगों को फॉर्म दिया गया था. लोग फाॅर्म भर कर जमा नहीं किये हैं. इसके कारण इसका लाभ नहीं मिला. मुखिया ने कहा कि बीडीओ से बात कर आवास दिलवाने का प्रयास करेंगे.मलका मुंडा, मुखिया.
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