Ranchi News : अंकुर की आस्था ऐसी कि जर्मनी से रांची खींच लायी महापर्व की महिमा

Updated at : 25 Oct 2025 5:44 PM (IST)
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Ranchi News : अंकुर की आस्था ऐसी कि जर्मनी से रांची खींच लायी महापर्व की महिमा

महापर्व छठ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों से निकलकर विदेशों में रह रहे लोगों को अपनी महिमा से आकर्षित कर रहा है.

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::: बतौर प्रोफेशनल्स जर्मनी की बोएह्रिंगर इंगेलहाइम कंपनी में कॉरपोरेट स्ट्रेटजी एंड कंसल्टिंग विंग में सीनियर कंसल्टेंट के बड़े पद पर कार्यरत

::: लंदन ऑफिस में काम करते हुए आंखें भर आयीं, तब से हर साल अपने देश आकर कर रहे छठ पूजा

रांची. महापर्व छठ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों से निकलकर विदेशों में रह रहे लोगों को अपनी महिमा से आकर्षित कर रहा है. इस क्षेत्र के लोग जहां भी बसे हैं, महापर्व छठ की महिमा ऐसी कि लाखों रुपये खर्च कर भी आस्था के इस पर्व में शामिल होने हर साल अपनी जमीन पर आते हैं. अरगोड़ा हाउसिंग कॉलोनी के एल-81 के रहने वाले अंकुर रंजन उनमें से एक हैं. लंदन, स्विट्जरलैंड के बाद अब वह जर्मनी के राइनाली, माइन्ज में अपने परिवार संग कई वर्षों से रह रहे हैं. वह जर्मनी की बोएह्रिंगर इंगेलहाइम कंपनी में कॉरपोरेट स्ट्रेटजी एंड कंसल्टिंग विंग में सीनियर कंसल्टेंट हैं. वह रांची के अपने घर में नौवीं बार व्रत की तैयारियों में जुटे हैं. छठ की पहली रस्म, नहाय-खाय का स्नान और सात्विक भोजन से व्रत की शुरुआत हो या 36 घंटे का निर्जला व्रत, बखूबी निभाया है. इस बार वह 21 अक्तूबर को जर्मनी से रांची पहुंचे हैं. वह कहते हैं कि बाहर रहने गये हैं, लेकिन अपनी परंपरा और सूर्योपासना के पर्व छठ को कैसे भूल सकते हैं.

ऑफिस में आंखें भर आयीं, तब से कर रहे छठ पूजा

अंकुर कहते हैं कि वे तब साल 2015 में लंदन में रह रहे थे. इस दौरान वहां रहते हुए छठ पूजा नहीं मना सके. घर पर छठ था, परिवार के लोगों से लगातार बात हो रही थी. ऑफिस के अंदर कंप्यूटर पर काम करते हुए रोना आ रहा था. इस बात का इतना अफसोस हुआ कि उन्होंने तय कर लिया कि भले वह इस साल छठ नहीं मना सके, लेकिन अब हर साल छठ मनाने घर जायेंगे. वह कहते हैं कि हम वापस जाकर अपने सहकर्मियों को इस प्रकृति पर्व के बारे में बताते हैं. सूर्य की महिमा पूरी दुनिया जान सके, यही उनका मकसद है.

पांच दिन की नौकरी छोड़, छठ के लिए रांची आया

विदेशों में बसे प्रवासी झील, बीच, तालाब या घरों में टब बनाकर सूर्य को अर्घ देते हैं. अपने देश के सूर्य को अपने लोगों के बीच अर्ध देना अलग ही सुकून देता है. रंजन कहते हैं कि पिछले साल मैंने जॉब चेंज किया था. पांच दिन बाद ही छठ था. मुझे हर हाल में छठ के लिए झारखंड आना था, मुझे अपने वर्कप्लेस पर प्रकृति पूजा के महत्व को समझाना पड़ा. मुझे छठ करने की अनुमति इस शर्त पर मिली की मुझे अपने हिस्से का काम पूरा करना होगा. मैंने तब खुशी-खुशी यह दोनों जिम्मेदारियां बखूबी निभायी.

रखते हैं उपवास, खुद ही सजाते हैं सूप

तीसरे दिन छठ का प्रसाद के रूप में ठेकुआ, चावल के लड्डू और चढ़ावे के रूप में फल शामिल होते हैं. शाम को पर्व के दौरान छठ के गीत गुनगुनाते बांस की टोकरी में अर्घ का सूप वह खुद अपने हाथों से सजाते हैं.

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