झारखंड के लोगों में बढ़ रहा है टेरेस गार्डन का चलन, अंगूर, ब्लूबेरी और ब्लैकबेरी समेत कई चीजों की कर रहे खेती

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार एक पौधे के लिए सिर्फ मिट्टी, पानी और धूप की जरूरत होती है. यह चीजें अपनी रांची की आबो-हवा में आसानी से उपलब्ध हैं. रांची की जलवायु में बागवानी के लिए बेहतर है.
रांची, लता रानी: रांची के मौसम के अनुकूल आसानी से छत पर बागवानी की जा सकती है. इसे राजधानीवासी साबित भी कर रहे हैं. छत पर बागवानी कर रहे हैं. इनकी बगिया में अंगूर, ब्लूबेरी, ब्लैकबेरी, मलबेरी तेजपत्ता, दालचीनी, जीरा, गोलकी, आम, अमरूद के अलावा रंगबिरंगी गोभी की उपज हो रही है. लता रानी की रिपोर्ट ऐसे ही कुछ गार्डनर पर आधारित है, जिनकी छतों पर सिर्फ फूल की महक नहीं, बल्कि फलों और सब्जियों की खेती भी हो रही है. स्ट्रॉबेरी और ड्रैगन फ्रूटस भी उपजा रहे हैं.
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार एक पौधे के लिए सिर्फ मिट्टी, पानी और धूप की जरूरत होती है. यह चीजें अपनी रांची की आबो-हवा में आसानी से उपलब्ध हैं. रांची की जलवायु में बागवानी के लिए बेहतर है. यहां हर कुछ उगाया जा सकता है. वैज्ञानिकों के अनुसार गर्मी में पत्तेदार सब्जियाें के अलावा भिंडी और बोदी को आसानी से उपजाया जा सकता है. पालक और धनिया तो सिर्फ 35-40 दिनों में तैयार हो जाते हैं. लाल साग का स्वाद भी अपनी बगिया में उपजा कर ले सकते हैं.
लालपुर निवासी नीतू सिंह अपनी छत पर मौसमी फल-सब्जियों के अलावा सेब, स्वीट कॉर्न, सलाद पत्ता, टोमैटो चिल्ली, स्ट्राॅबेरी और ड्रैगन फ्रूट तक उगा रही हैं. इनकी छत के गमले में करीब 200 प्रकार के पौधे हैं. वह कहती हैं : इन पौधों के बीच रहना सुकून देता है. खेती-किसानी मुझे विरासत में मिली है. नाना के नक्शे कदम पर चलकर ही बचपन से बागवानी कर रही हूं. आपका अनुभव आपको पेड़-पौधों के पालन-पोषण करने का तरीका बता देता है.
बरियातू निवासी रिटायर कर्नल समित शाहा की छत पर लगभग विभिन्न फलों के पेड़-पौधे देख सकते हैं. वह भी गमले में. गमले में आम, अमरूद, पपीता के अलावा मौसमी के पेड़ भी हैं. इनकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ते. 22 साल तक आर्मी में सेवा दी. फिर रिलायंस और जिंदल में बड़े पदों पर सेवा दी. अभी झारखंड हाइकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं. इसके बावजूद भी गार्डनिंग के लिए समय निकाल लेते हैं. इनके लॉन में भी फूलों की खूबसूरती बिखरी रहती है. खास बात है कि इनकी बगिया में कई डॉक्यूमेंटरी और नागपुरी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है.
कांके के चार्ल्स डेविस के बगीचे में ब्लूबेरी, ब्लैकबेरी, मलबेरी, हरे-काले अंगूर और चेरी तक की खेती हो रही है. साथ ही चार्ल्स बड़े पैमाने पर कॉफी की भी खेती कर लेते हैं, जो साल में एक बार होती है. इनके बगीचे में ब्लैक नीलगिरी काॅफी के पौधे हैं. साथ ही हर तरह के कच्चे मसाले के अलावा तेजपत्ता, दालचीनी, जीरा, गोलकी और धनिया मिर्ची की भी उपज होती है. चार्ल्स उन्हें अनाथालयों और अस्पतालों में भी डोनेट करते हैं. वह कहते हैं : गार्डनिंग पूरे परिवार का शौक है. दिल से इन सभी फलों-सब्जियों की खेती करते हैं.
बरियातू निवासी संजय सिंह अपनी छत पर रंग-बिरंगी फूलगोभी की खेती कर रहे हैं. इस समय उनके गमले में गुलाबी और पीले फूलगोभी की खूबसूरती देखते ही बन रही है. इसे सिर्फ तीन महीने पहले लगाया था. संजय के छोटे से घर की छत पर करीब 60 गमले हैं, जिसमें गोभी, टमाटर, मिर्ची, बैंगन उपजा रहे हैं. वह कहते हैं : पौधों के साथ नया प्रयोग कर फल-सब्जियों को नये रूप देने की कोशिश करता हूं.
यही कारण है कि एक ही गमले में टमाटर के साथ बैंगन भी फल रहे हैं. इस सीजन उन्होंने इसी टेरेस गार्डनिंग से 200 किलो टमाटर की उपज की. कहते हैं : सब्जियों के छिलके से खाद बनाकर महीनों बाद उससे निकले लिक्विड का इस्तेमाल पौधों में करते हैं. इससे पौधाें का बेहतर विकास होता है. साथ ही सब्जियों का रूप में भी अलग दिखता है. रंग-बिरंगी फूलगोभी भी इस प्रयोग का परिणाम है.
डंगरा टोली निवासी मंजू राठौर ने बालकनी और छत को ही बगीचा बना लिया है. छत के बगीचे में हरी साग सब्जी के अलावा अमरूद, नींबू और चीकू जैसे फल भी उपजा ले रही हैं. इनकी बगिया में फूल गोभी, पत्तागोभी, टमाटर, पालक, बैंगन, धनिया पत्ती, लाल साग, सेम, कुंदरी और कद्दू की उपज रही है. मंजू कहती हैं : पूरे साल कोई भी सब्जी नहीं खरीदनी पड़ती. कोरोना काल में बागवानी की शुरुआत की. समय भी कट जाता है और इसी बहाने प्रकृति से जुड़े रहने का मौका भी मिल जाता है.
जोड़ा तालाब निवासी आलम इमाम 32 सालों से रिम्स में कार्यरत हैं. वह खाली समय में घर की छत पर ही बागवानी करते हैं. 200 से ज्यादा गमले हैं और इन गमलों में टमाटर की खेती करते हैं. 1440 वर्ग फुट की छत पर इस समय टमाटर ही टमाटर ही दिख रहा है. वह कहते हैं : पिछले वर्ष इस सीजन में करीब 300 किलो टमाटर की खेती हुई थी. इस वर्ष भी अब तक 200 किलो टमाटर तोड़ चुके हैं. आलम कहते हैं : टमाटर की अच्छी खेती के लिए मछली के खाद का इस्तेमाल काफी फायदेमंद है.
कांके रोड निवासी पौंकी बजाज घर की छत पर प्याज की खेती कर रही हैं. हर साल लगभग 70-80 किलो प्याज उपजा लेती हैं. इसलिए बाजार से प्याज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है. यूं तो इनकी छत के गमलों हर तरह के फल, फूल और सब्जियां हैं, लेकिन बगीचे में नारियल का पेड़, अंगूर, संतरा, नींबू , हल्दी और अदरक खास हैं. गमले में ही 10- 15 किलो हल्दी और अदरक की उपज हो जाती है. वहीं बोनसाई भी आकर्षण के केंद्र हैं. वह कहती हैं : मैं इनकी देखभाल खुद करती हूं.
रांची का मौसम फल-सब्जियों की खेती के लिए अनुकूल हैं. लोग छत के बगीचे में हर तरह की फल-सब्जी उगा रहे हैं. रांची के मौसम में आम, अमरूद, पपीता और नींबू उगाये जा सकते हैं. अब तो यहां अंगूर भी उपजाया जा रहा है, लेकिन यह रांची के मौसम के अनुरूप का फल नहीं है. इसलिए यहां के अंगूर में खटास ज्यादा रहती है, जिसका प्रयोग लोग जैम और जेली बनाने में कर लेते हैं.
-अनूप कुमार, नर्सरी संचालक
लोग छतों पर बागवानी कर रहे हैं, यह बहुत ही अच्छी बात है. आप सिर्फ कंक्रीट देखते हैं उसका असर और जब फूल-पत्तियों को देखते हैं, तब उसका असर अलग-अलग पड़ता है. फूल-पत्तियों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है. मौसमी फूल-पत्ते लगाने की जगह यदि पौधा लगाया जाये, तो यह पर्यावरण के लिए ज्यादा बेहतर है.
-शिवेंद्र कुमार, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, प्लांडू
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By Prabhat Khabar News Desk
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