सालखन मुर्मू बोले- जो दे सरना धर्मकोड, उसी को मिलेगा आदिवासी वोट

राजनीतिक पार्टियां या तथाकथित आदिवासी संगठन इनकी मदद नहीं कर पा रहे क्योंकि वे राजनीतिक विचारधाराओं के बीच बंटे हैं, जिसमें आदिवासियों के मुद्दे गौण हैं.
आदिवासी सेंगेल अभियान के सरना धर्म कोड जनसभा में झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश से बड़ी संख्या में आदिवासी शामिल हुए. देश के 15 कराेड़ आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड की मांग की. मौके पर राष्ट्रीय अध्यक्ष सालखन मुर्मू ने कहा कि संसद के शीतकालीन सत्र में भाजपा या कांग्रेस, जो पार्टी सरना धर्म कोड की बात करेगी, आगामी लोस चुनाव में देश के आदिवासी उस पार्टी को वोट देंगे. यदि प्रधानमंत्री 15 नवंबर को उलिहातू दौरा में इसकी घोषण करते हैं, तो यह समर्थन भाजपा को जायेगा. उन्होंने कहा कि यदि आदिवासियों को उनकी धार्मिक आजादी नहीं मिलती है, तो 30 दिसंबर को भारत बंद करेंगे. इन 50 दिनों में हर गांव- गांव में घूम कर इसे चुनावी मुद्दा बनाया जायेगा.
कहा कि भारत में ही आदिवासी राष्ट्र की अवधारणा को धरातल पर उतारा जाये. जिस तरह जिस तरह बंगालियों के लिए बंगाल, पंजाबियों के लिए पंजाब, गुजरातियों के लिए गुजरात बना है. तभी उनकी भाषा, धर्म, नौकरी, इज्जत, जमीन आदि बच पायेंगे. राजनीतिक पार्टियां या तथाकथित आदिवासी संगठन इनकी मदद नहीं कर पा रहे क्योंकि वे राजनीतिक विचारधाराओं के बीच बंटे हैं, जिसमें आदिवासियों के मुद्दे गौण हैं. उन्होंने कहा कि 10 दिसंबर को मरांग बुरु बचाओ सेंगेल यात्रा निकाली जायेगी. सभा में काफी संख्या में लोग मौजूद थे.
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पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को भी जनतांत्रिक बनाने की आवश्यकता है. जनसभा को देवनारायण मुर्मू, नरेंद्र हेंब्रम, बुधन मार्डी, सुमित्रा मुर्मू, तिलका मुर्मू, स्वप्न सोरेन, बरियड़ हेंब्रम, अमर कुमार मरांडी, मोहन हांसदा, फूलचंद तिर्की, भुवनेश्वर लोहरा, शांति उरांव, सोहन हेम्ब्रम, विश्वनाथ टुडू, मोहन हंसदा, सोनाराम सोरेन व गणेश चंद्र हेम्ब्रम ने भी संबोधित किया.
जनसभा के दौरान सरना धर्म कोड के लिए स्व डॉ करमा उरांव के योगदान को स्मरण करते हुए उनकी धर्मपत्नी शांति उरांव को सम्मानित किया गया. इसी तरह संताली भाषा आंदोलन के योद्धा स्वर्गीय साहेब राम मुर्मू की भूमिका को देखते हुए उनके पुत्र देवदुलाल मुर्मू को सम्मानित किया गया.
देशभर के आदिवासी 10 दिसंबर को मधुबन, पारसनाथ, गिरिडीह में जमा होंगे. वहीं, दुमका में 22 दिसंबर को हासा भाषा विजय दिवस मनाया जाएगा.
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By Prabhat Khabar News Desk
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