विदेशी बाजार में भी छाया रांची का कॉन्वेंट वर्क, एथनिक टच के साथ दे रहा स्टाइलिश लुक, जानें क्या है खासियत
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 08 Jun 2023 8:32 AM
रांची कॉन्वेंट वर्क वाली एक साड़ी की कीमत 14000-15000 रुपये तक होती है. इस वर्क में काफी समय लगता है, इसलिए अब मशीन का इस्तेमाल होने लगा है.
रांची, लता रानी :
रांची कॉन्वेंट वर्क. यह एम्ब्रॉयडरी है. हाथ से कढ़ाई किया हुआ कॉन्वेंट वर्क. महिलाओं के नवीनतम फैशन में इसकी बखूबी पहचान बन चुकी है. देश ही नहीं बल्कि विदेशी बाजार में भी रांची कॉन्वेंट वर्क का बोलबाला है. कॉन्वेंट वर्क बेहद बारिक कढ़ाई है. अलग-अलग रंगों के रेशम का इस्तेमाल होता है. कॉटन धागों से खूबसूरती मिलती है. यानी एथनिक टच के साथ स्टाइलिश लुक. कारीगरों का कहना है कॉन्वेंट का शेडेड वर्क यानी दाे-तीन रंगों का शेडेड वर्क सिर्फ रांची में ही होता है.
इसे नेट, सिल्क, कॉटन, शिफॉन, जॉरजेट, क्रेप और रॉ सिल्क में बनाया जाता है. कड़ी मेहनत के साथ-साथ इसकी कीमत भी अधिक होती है. यही कारण है कि एक दुपट्टे की कीमत पांच हजार रुपये से शुरू होती है. वहीं एक साड़ी की कीमत 14000-15000 रुपये तक होती है. इस वर्क में काफी समय लगता है, इसलिए अब मशीन का इस्तेमाल होने लगा है. मशीन से कॉन्वेंट के बैग, फाइल कवर, फाेल्डर, लंच बॉक्स कवर, कुशन कवर, डाइनिंग मैट, पर्स और लिफाफे आदि भी बनने लगे हैं.

रांची कॉन्वेंट वर्क का इतिहास करीब 100 वर्ष पुराना है. बेल्जियम से आयीं सिस्टर्स ने कॉन्वेंट सोसाइटी की शुरुआत की. धर्म प्रचारक सिस्टर्स ने रांची की महिलाओं और बच्चों की स्थिति को देखकर उन्हें सशक्त बनाने की योजना भी बनायी. उसके बाद उर्सुलाइन कॉन्वेंट में गरीब महिलाओं को कॉन्वेंट वर्क की ट्रेनिंग मिलने लगी. पहले कॉन्वेंट वर्क का काम सिर्फ चादर, टेबल क्लॉथ, पिल्लो कवर पर किया जाता था. इसी वर्क से मिशनरी के लोगो भी बनाये जाते थे. धीरे-धीरे परिधानों में भी इस्तेमाल होने लगा. इससे महिलाओं में रोजगार के आसार भी बढ़े. आज भी उर्सुलाइन कान्वेंट स्कूल में यह काम चल रहा है. महिलाएं रोजगार पा रही हैं. इसका फायदा रांची के कारीगरों और दूसरी महिलाओं को भी मिल रहा है. सभी मिलकर रांची कॉन्वेंट वर्क को विस्तार दे रहे हैं.
हिंदपीढ़ी निवासी कारीगर साजिद खान बताते हैं कि रांची के काॅन्वेंट वर्क की तारीफ हर जगह होती है. राजधानी के कारीगरों ने कॉन्वेंट का काम शेडिंग के साथ शुरू किया. खास बात है कि कॉन्वेंट वर्क में शेडिंग का काम रांची से ही शुरू हुआ. हालांकि आज कुछ दूसरी जगहों पर भी शेडिंग का काम हो रहा है. लेकिन रांची के कॉन्वेंट वर्क की खूबसूरती विदेशों में भी पहुंच चुकी है. हजारीबाग, चतरा और कोलकाता के कारीगर भी कॉन्वेंट वर्क से जुड़ चुके हैं. गुवाहाटी, बनारस, बेंगलुरु और पुणे में भी रांची कॉन्वेंट वर्क की पहुंच बन चुकी है. पटना, मुंबई, सूरत और राजस्थान में भी हमारे कॉन्वेंट वर्क को पसंद किया जाता है.
अपर बाजार में एक छोटी सी दुकान का संचालन करनेवाली नीरा बथवाल कहती हैं कि वैसी महिलाएं और कारीगर जो अपने उत्पादों की ब्रिक्री नहीं कर सकते, वे अपने उत्पादों को हमारे यहां रख सकते हैं. यहां से उत्पाद की मार्केटिंग और बिक्री की जाती है. गर्व होता है कि इतनी डिमांड में रहने वाली चीज हमारे अपने शहर की है.
महिलाओं को हुनर से सशक्त कर रही हैं मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी कामिनी कुमारी ने बताया कि झारखंड के कारीगर कॉन्वेंट वर्क में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं. इसकी डिमांड विदेश में भी है. मुझे दो बार दुबई और सिंगापुर में लगी प्रदर्शनी में जाने का मौका मिला. अपने स्टॉल पर मधुबनी आर्ट के साथ रांची के कॉन्वेंट वर्क को पेश किया, जहां खूब सराहना मिली. पहले कॉन्वेंट वर्क नेट पर बनते थे, अब शिफॉन, और्गेंजा, क्रेप सिल्क आदि में बनने लगे हैं.
एम्ब्रॉयडरी वर्क की विशेषज्ञ शालिनी जायसवाल कहती हैं : बचपन से ही मैं एम्ब्रॉयडरी से जुड़ी हुई हूं. इसमें पारसी वर्क, कश्मीरी वर्क, जरदोजी वर्क और दबका वर्क शामिल है. लेकिन रांची कॉन्वेंट वर्क को देखकर अलग ही महसूस हुआ. मेरे बुटीक में बने परिधानों में कारीगर कान्वेंट वर्क ही करते हैं. देशभर में रांची और कोलकाता के कारीगरों का कॉन्वेंट वर्क अलग है. वर्तमान में कारीगर फ्रेंच नॉट, शेडेड वर्क, कश्मीरी वर्क को कॉन्वेंट वर्क के साथ मिलाकर तैयार कर रहे हैं. दिन पर दिन इसकी मांग बढ़ती जा रही है.
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