रांची. शुद्ध हवा और शुद्ध पानी सबको चाहिए. अच्छा पर्यावरण की जरूरत भी संसार में हर किसी को है. खाद्य सुरक्षा की गारंटी भी हर व्यक्ति के लिए होनी चाहिए. लेकिन ये चीजें तब तक नहीं हो सकती हैं, जब तक जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा नहीं हो जाती. उक्त बातें सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला ने रविवार को कहीं. वह अजम एंबा के तत्वावधान में ऑड्रे हाउस में आयोजित फूड फेस्टिवल ””अनकादिरी”” के दौरान परिचर्चा में बोल रही थी.
किसानों को कम गुणवत्तावाले चावल दिये जा रहे
मौके पर लातेहार के सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने कहा कि किसानों को कम गुणवत्तावाले चावल दिये जा रहे हैं. कई क्षेत्रों में ग्रामीणों ने इसकी शिकायत की है. यह अच्छी बात है कि इंडीजिनस फूड फेस्टिवल के बहाने हम गंभीर चर्चा की ओर लौट रहे हैं. झारखंड की पारंपरिक खेती को खत्म कर एक तरह से खाद्य संप्रुभता को चुनौती दी जा रही है. हमें पर्यावरण संबंधी चुनौती को भी समझना होगा. तितली, केंचुआ और मधुमक्खी जैसी चीजें नहीं होंगी, तो हमारी भी परेशानी और बढ़ेगी.
आदिवासी खाद्य संस्कृति ही मुख्य धारा में हो शामिल
वहीं खाद्य सुरक्षा पर काम करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता बलराम ने कहा कि आज इस बात पर चर्चा हो रही है कि मुख्य धारा की खाद्य संस्कृति में आदिवासी खाद्य पदार्थ कैसे शामिल हों. लेकिन मुझे लगता है कि आदिवासी खाद्य संस्कृति ही मुख्य धारा की खाद्य संस्कृति होनी चाहिए, क्योंकि यह पहले भी थी, आज भी है और हमेशा रहेगी. ओडिशा से आये अभिषेक मिश्रा और अभिषेक गुप्ता ने बताया कि वहां पर आदिवासी समुदाय के बीच से धान व अन्य मोटे अनाजों के सैंपलों को एकत्र किया गया है. अब उन्हें बाजार में उपलब्ध कराने के लिए वैल्यू एडीशन किया जा रहा है. इस अवसर पर अजम एंबा की अरुणा तिर्की सहित अन्य लोग भी उपस्थित थी.
डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

