JSSC CGL परीक्षा रद्द कर सकती है सरकार या नहीं? जानें क्या कहते हैं पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार
झारखंड के पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार (बाएं) और आंदोलनरत छात्र-छात्राएं. फोटो: प्रभात खबर
JSSC CGL परीक्षा को लेकर चल रहे विवाद के बीच पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने झारखंड सरकार को महत्वपूर्ण सलाह दी है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि कानूनी अड़चनें नहीं हैं और सरकार ठोस निर्णय ले सकती है. जानें क्या है पूरी रिपोर्ट.
रांची से अभिषेक आनंद की रिपोर्ट
JPSC Student Protest: JSSC CGL परीक्षा को लेकर जारी विवाद के बीच पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने झारखंड सरकार को परीक्षा और नियुक्तियों के संबंध में ठोस निर्णय लेने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में छात्रों के हित में कोई निर्णय लेना चाहती है, तो उसके सामने कोई बड़ी कानूनी कठिनाई नहीं है. उन्होंने कहा, 'यह कहना कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और इसलिए CGL परीक्षा या नियुक्तियों को रद्द नहीं किया जा सकता, सही स्थिति नहीं है.' उन्होंने कहा कि न्यायालय ने नियुक्तियों को जांच के परिणाम के अधीन रखा है. ऐसे में सरकार केस डायरी में दर्ज तथ्यों और शुरुआती जांच के आधार पर उचित निर्णय ले सकती है.
शुरुआती जांच के तथ्यों पर निर्णय ले सकती है सरकार
पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने कहा कि उन्हें छात्रों और अन्य स्रोतों से जानकारी मिली है कि राज्य सरकार वास्तव में छात्रों के संबंध में एक ठोस निर्णय लेना चाहती है और संभवतः इस बात को लेकर कानूनी सलाह चाहती है कि CGL परीक्षा के संबंध में कोई निर्णय किस तरह लिया जाए. उन्होंने कहा कि यदि सरकार के सामने यह उलझन है कि मामला अदालत में सब-जुडिस है, इसलिए परीक्षा या नियुक्तियां रद्द नहीं की जा सकतीं, तो यह धारणा सही नहीं है. उन्होंने सरकार से कहा कि वह केस डायरी के विभिन्न पक्षों और शुरुआती जांच में दर्ज तथ्यों को आधार बनाकर निर्णय ले सकती है.
सरकार को संस्थाओं पर भरोसा बहाल करना चाहिए
उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन कर रहे हैं, जबकि छात्रों का काम पढ़ाई करना, अपना चरित्र बनाना और भविष्य के लिए तैयार होना है. युवा ही आगे समाज को चलाएंगे और वे देश तथा समाज का भविष्य हैं. ऐसी परिस्थिति में सरकार को छात्रों की परेशानी समझते हुए उनकी संस्थाओं पर भरोसा बहाल करने वाला निर्णय लेना चाहिए.
2023 में परीक्षा रद्द, 2024 में दोबारा एग्जाम
पूर्व महाधिवक्ता ने कहा कि JSSC CGL परीक्षा उनके अधिवक्ता के करियर का महत्वपूर्ण मामला रहा है. उन्होंने बताया कि 2024 में हुई CGL परीक्षा से पहले 2023 में भी परीक्षा आयोजित की गई थी. उस परीक्षा में पेपर लीक की बातें सामने आई थीं. परीक्षा शुरू होने से पहले ही छात्रों ने JSSC को इसकी जानकारी दी थी. इसके बाद वह परीक्षा रद्द कर दी गई थी. लंबे समय के बाद 2024 में दोबारा परीक्षा आयोजित की गई.
2024 की परीक्षा से दो दिन पहले उत्तर लीक
उन्होंने कहा कि 2024 की परीक्षा से दो दिन पहले एक अलग तरीके से उत्तर लीक होने की बात सामने आई. उनके अनुसार, इसमें पूरा प्रश्न नहीं था और चार विकल्पों में से तीन विकल्प भी नहीं थे. केवल एक विकल्प या उत्तर प्रसारित किया जा रहा था. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि प्रश्न हो कि सूरज किस दिशा में उगता है और केवल ‘पूरब’ उत्तर के रूप में प्रसारित किया जाए, जबकि पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के विकल्प तथा मूल प्रश्न ही उपलब्ध न हों, तो परीक्षा में ‘पूरब’ आने पर अभ्यर्थी उसे आसानी से चिन्हित कर सकता है.
इसी तरह उन्होंने गणित के प्रश्नों का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘32’ कई अलग-अलग गणितीय प्रश्नों का उत्तर हो सकता है. यदि केवल 32 को लीक किया गया और प्रश्न तथा बाकी तीन विकल्प उपलब्ध नहीं थे, तो परीक्षा में कहीं भी 32 मिलने पर अभ्यर्थी उसे टिक कर सकता है. उनके अनुसार, इसी तरह करीब 120 या उससे अधिक उत्तर अलग-अलग स्रोतों के माध्यम से प्रसारित किए गए थे.
नेपाल और नियामतपुर में कैंप चलने का दावा
पूर्व महाधिवक्ता ने दावा किया कि परीक्षा शुरू होने से दो दिन पहले उत्तरों का सर्कुलेशन हो रहा था और नेपाल में एक कैंप चल रहा था, जहां बड़ी संख्या में छात्रों को बुलाकर कथित तौर पर उत्तर रटाए गए. उन्होंने पश्चिम बंगाल के नियामतपुर में भी इसी तरह का कैंप चलने की बात कही. उन्होंने कहा कि न्यायालय की फटकार के बाद FIR दर्ज हुई और मामले में जांच शुरू हुई. उनके अनुसार, शुरुआती दौर में जांच सही दिशा में चल रही थी. केस डायरी में काफी साक्ष्यों का उल्लेख था और कई आरोपियों के कथित स्वीकारोक्ति बयान भी उपलब्ध थे. उन्होंने कहा कि एक छात्र के कथित बयान में 120 प्रश्न और उनके उत्तर रटाए जाने की बात कही गई थी. उनके अनुसार, उस छात्र को 150 उत्तर रटाए गए थे, जिनमें से 120 उत्तर परीक्षा में सटीक रूप से मिले. उन्होंने स्पष्ट किया कि वह ऐसे छात्रों और आरोपियों की बात कर रहे हैं, जो परीक्षा से सीधे जुड़े थे और जिन्हें कथित पेपर या उत्तर लीक का लाभ मिला था.
अदालत की फटकार के CID नोटिस जारी किया
उन्होंने बताया कि CID ने न्यायालय की फटकार के बाद पब्लिक नोटिस जारी किया था. इसके बाद काफी छात्रों ने अपनी ओर से साक्ष्य CID को भेजे. उनके अनुसार, इनमें कई ऐसे साक्ष्य थे, जिन पर विचार और आगे जांच की आवश्यकता थी.
डेढ़ साल बाद सरकार ने बदल दी जांच की दिशा
पूर्व महाधिवक्ता ने कहा कि जांच चलती रही और करीब डेढ़ वर्ष बीत गया. इस दौरान परीक्षा के परिणाम पर रोक रही. न्यायालय ने कई बार आदेश पारित किए और JSSC या राज्य सरकार की ओर से बार-बार स्टे हटाने की मांग की गई. उन्होंने कहा कि करीब डेढ़ वर्ष बाद राज्य सरकार ने कुछ कारणों से, जिनका वह खुलासा नहीं करना चाहते, जांच की दिशा बदल दी. इसके बाद न्यायालय में दायर हलफनामों के माध्यम से यह बताया जाने लगा कि कथित लीक व्यापक या बहुत ज्यादा वाइड स्प्रेड नहीं थी. उन्होंने कहा कि दूसरी ओर केस डायरी में साक्ष्य मौजूद थे. इसके बावजूद राज्य सरकार और JSSC की ओर से अदालत में यह कहा गया कि कोई प्रश्न या उत्तर लीक नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि जांच अभी चल रही है और अब तक की जांच में कुछ तथ्य मिले हैं, लेकिन यह व्यापक लीक का मामला नहीं है. साथ ही कथित तौर पर यह समझाने का प्रयास किया गया कि छात्रों ने गेस करके उत्तर सही किए थे.
‘गेस’ के तर्क पर पूर्व महाधिवक्ता ने उठाए सवाल
उन्होंने सवाल किया कि यदि मूल प्रश्न ही उपलब्ध नहीं था और चार विकल्पों में से तीन भी गायब थे, तो किसी एक उत्तर का अनुमान कैसे लगाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि यदि 32, 99 या 79 जैसे उत्तर छात्रों के बीच परीक्षा से पहले शेयर हो रहे थे, तो 79 जैसे उत्तर कई गणितीय प्रश्नों का उत्तर हो सकते हैं. ऐसे में कोई छात्र उसे परीक्षा से पहले दूसरे छात्रों के साथ क्यों शेयर करेगा, यह भी गंभीर सवाल है. उन्होंने कहा कि पूरा घटनाक्रम परीक्षा से दो दिन पहले का था. राज्य सरकार और उसकी एजेंसियों को मामले की गंभीरता से जांच करनी चाहिए थी. उनके अनुसार, शुरुआती जांच तो हुई, लेकिन बाद में उसे उसी गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाया गया. उन्होंने कहा कि न्यायालय ने भी अंततः सरकार के पक्ष को स्वीकार किया और यह स्पष्ट किया कि लीक व्यापक स्तर की दिखाई नहीं देती.
नियुक्तियां जांच के परिणाम के अधीन, तो अड़चन क्यों?
पूर्व महाधिवक्ता ने कहा कि CGL में केवल दो हजार से कुछ अधिक सीटों पर नियुक्तियां होनी थीं. ऐसे में कथित लीक का व्यापक होना केवल डेढ़ लाख अभ्यर्थियों के बीच होना जरूरी नहीं है. यदि 50 प्रतिशत यानी करीब एक हजार छात्रों के बीच भी उत्तर प्रसारित हुए हों, तो भी यह गंभीर विषय है. उन्होंने कहा कि जांच की गंभीरता और उसके सूत्रों पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
सरकार को किस आधार पर मिली नियुक्ति की अनुमति?
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को नियुक्तियां करने की अनुमति इस आधार पर दी गई थी कि जांच छह महीने में पूरी की जाएगी और यदि मामले में आगे कुछ पाया जाता है तो नियुक्तियां रद्द की जा सकती हैं. ऐसे में सरकार के सामने निर्णय लेने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए. यदि सरकार के अधिकारी कुछ भी नहीं मिलने की मंशा से जांच कर रहे हैं, तो स्थिति अलग है. लेकिन यदि सरकार छात्रों की परेशानी को समझना चाहती है तो केस डायरी में दर्ज विभिन्न तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है.
सरकार ने जांच की दिशा क्यों बदली?
उन्होंने सरकार से सवाल किया कि जांच की दिशा क्यों बदली और परीक्षा से लाभान्वित होने वाले लोगों को बचाने की कवायद क्यों हो रही है. ऐसे लोगों के बारे में अब तक पूरी जानकारी क्यों नहीं जुटाई गई. उन्होंने कहा कि यदि सरकार कुछ नहीं करना चाहती है तो उसके पीछे मजबूत तथ्य होने चाहिए. केवल यह कहना कि मामला न्यायालय से संबंधित है और अदालत के आदेश के कारण निर्णय नहीं लिया जा सकता, उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि जब न्यायालय ने नियुक्तियों को ही जांच के परिणाम के अधीन रखा है तो सरकार को जांच पूरी कर उचित निर्णय लेना चाहिए. यदि पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो नियुक्तियां रद्द की जा सकती हैं. ऐसी स्थिति में दोबारा न्यायालय जाने पर भी सरकार के पास अपने निर्णय के समर्थन में तथ्य और साक्ष्य होंगे.
नेपाल और नियामतपुर की जांच पर भी सवाल
पूर्व महाधिवक्ता ने कहा कि छात्रों की ओर से दिए गए सभी साक्ष्यों की जांच होनी चाहिए थी. यदि नेपाल के मामले में जांच की गई तो यह भी पता लगाया जाना चाहिए था कि वहां बड़ी संख्या में पहुंचे छात्र किस होटल में ठहरे थे, कब से कब तक वहां रहे और क्या कोई ऐसा गवाह उपलब्ध है, जो यह पुष्टि कर सके कि छात्रों को लिखे हुए उत्तर पढ़ाए या रटाए गए थे. उन्होंने कहा कि इसी तरह की जांच नियामतपुर और अन्य स्थानों पर भी होनी चाहिए थी. उनके अनुसार, यदि कोई संगठित सिंडिकेट काम कर रहा था तो उसकी पूरी पड़ताल जरूरी थी. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे संभावित सिंडिकेट की जांच क्यों नहीं की गई. उन्होंने कहा कि छात्रों द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों के प्रत्येक बिंदु की जांच नहीं होना इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल है.
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साक्ष्यों की समीक्षा कर सरकार ले सकती है निर्णय
पूर्व महाधिवक्ता ने कहा कि सरकार यदि छात्रों का भरोसा अपनी संस्थाओं पर कायम करना चाहती है तो उसे उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा कर तत्काल उचित निर्णय लेना चाहिए. उनके अनुसार, CGL परीक्षा और नियुक्तियों को लेकर कानूनी रास्ता बंद नहीं है, क्योंकि नियुक्तियों को जांच के परिणाम के अधीन रखा गया है. ऐसे में अब सरकार को यह तय करना है कि वह केस डायरी में दर्ज तथ्यों और जांच के साक्ष्यों के आधार पर क्या ठोस कदम उठाती है.
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