भौगोलिक कटन का दंश झेल रहा खलारी से सटा चान्हो प्रखंड का जोबरो गांव

Published by : DINESH PANDEY Updated At : 25 May 2026 7:53 PM

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जोबरो गांव की कहानी सरकारी उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण है.

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खलारी. प्रशासनिक और भौगोलिक विडंबना का दंश झेल रहे जोबरो गांव की कहानी सरकारी उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण है. तकनीकी और सरकारी कागजों में यह आदिवासी बहुल जोबरो गांव खलारी से सटे चान्हो प्रखंड के अंतर्गत आता है, लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि रास्ता नहीं होने के कारण यह गांव अपने ही प्रखंड चान्हो से पूरी तरह कटा हुआ है. चान्हो प्रखंड प्रशासन की अनदेखी की वजह से यहां के 25 आदिवासी परिवारों का अपने ही प्रखंड मुख्यालय से कोई सीधा संपर्क नहीं है. अपनी रोजमर्रा की जरूरतों, राशन-पानी और रोजगार के लिए इस गांव की पूरी निर्भरता खलारी बाजार पर है. चान्हो से पूरी तरह कटे होने के कारण इस गांव की सुध लेने न तो चान्हो प्रखंड के अधिकारी पहुंचते हैं और न ही खलारी प्रशासन इसे अपना क्षेत्र मानता है. इसी कटन के फेर में फंसे होने की वजह से आज भी गांव के पात्र लोग अबुआ आवास, प्रधानमंत्री आवास और विधवा पेंशन जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से पूरी तरह वंचित हैं.

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ग्रामीणों ने खुद श्रमदान कर बनाया था खलारी से संपर्क मार्ग

जानकार बताते हैं कि लगभग एक दशक पूर्व तक जोबरो गांव से खलारी आने-जाने के लिए कोई मार्ग अस्तित्व में था ही नहीं. पूरा इलाका घने जंगलों और पथरीले पहाड़ों से घिरा हुआ था और सिर्फ एक संकरा पैदल रास्ता था. चान्हो से संपर्क न होने और खलारी बाजार तक पहुंचने में होनेवाली भारी दिक्कतों को देखते हुए गांव के आदिवासियों ने खुद अपनी किस्मत बदलने की ठानी. ग्रामीणों ने खुद कुदाल-फावड़ा उठाया और कड़ी मेहनत व पोकलेन मंगवाकर पहाड़ों को काट कर खलारी की तरफ आने वाला यह कच्चा संपर्क मार्ग तैयार किया. ग्रामीणों के इसी ऐतिहासिक प्रयास के बाद ही इस सुदूर गांव में करीब आठ साल पहले बिजली की लाइन पहुंच सकी. लेकिन रास्ता पक्का न होने और भीषण गर्मी में यहां का एकमात्र चापाकल व सरकारी कुआं सूख जाने के कारण, आज भी ग्रामीण गांव से 200 मीटर दूर बहने वाली सपही नदी के निकट चुआं खोदकर मटमैला पानी पीने को विवश हैं.

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बरसात में टापू बन जाता है गांव, खाट के सहारे तय होता है अस्पताल का सफर

खलारी को जोड़ने वाला यह ग्रामीण मार्ग कच्चा होने के कारण मानसून की शुरुआत होते ही पूरी तरह संपर्क टूट जाता है. बारिश के दिनों में जोबरो गांव और खलारी दोनों तरफ से पूरी तरह कट कर एक टापू का रूप ले लेता है. सड़क की इस भयावह स्थिति का सबसे दर्दनाक असर गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों पर पड़ता है. प्रसव पीड़ा के दौरान किसी भी वाहन या एम्बुलेंस का पहुंचना आम दिनों में मुश्किल होता है, बरसात के दिनों में किसी वाहन का गांव तक आना असंभव हो जाता है. ऐसी आपातकालीन स्थिति में गांव के युवा लाचार होकर मरीज को चारपाई पर लेकर कई किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग तक की दूरी पैदल तय करते हैं.

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क्य कह रहे हैं जोबरो गांव के लोग

धनेश्वर मुंडा ने कहा कि हम चान्हो प्रखंड के नक्शे में आते हैं, लेकिन भौगोलिक रूप से पूरी तरह कटे हैं. वहां जाने का कोई रास्ता ही नहीं है. हमारा सब कुछ खलारी बाजार ही है, पर चान्हो का हिस्सा होने के कारण यहां न तो चान्हो का कोई अधिकारी झांकने आता है और न ही खलारी प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझता है.

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सबिता देवी

ने बताया कि सड़क नहीं होने से सबसे ज्यादा परेशानी हमारी बहु-बेटियों को होती है. राशन-पानी, पढ़ाई और इलाज के लिए हमें हर दिन खलारी ही जाना पड़ता है. लेकिन मानसून की शुरुआत होते ही यह कच्चा मार्ग पूरी तरह बाधित हो जाता है और पूरा गांव एक टापू जैसा बन जाता है.

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सीता देवी

ने बताया कि एक दशक पहले तक यहां सिर्फ पैदल चलने की संकरी पगडंडी थी. हम ग्रामीणों ने अपनी जरूरत को देखते हुए खुद मेहनत करके पहाड़ों और जंगलों के बीच से खलारी जाने-आने का यह रास्ता बनाये. ग्रामीणों के प्रयास से बिजली तो आ गयी, पर सरकार ने आज तक इस मार्ग को पक्का नहीं किया.

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बसंती देवी

ने बताया कि गांव में पीने के पानी का घोर संकट है और गर्मी में सरकारी स्रोत सूखने पर हमें नदी के चुआं पर निर्भर रहना पड़ता है. सबसे ज्यादा डर बरसात में लगता है, जब रास्ता बंद होने पर गर्भवती महिलाओं को खाट पर लादकर पैदल मुख्य सड़क तक ले जाना हमारी मजबूरी बन जाती है.

खलारी बाजार आने के लिए ग्रामीणों ने खुद पहाड़ काट कर बनाया था रास्ता

नक्शे में चान्हों प्रखंड का हिस्सा, पर हर जरूरत के लिए खलारी पर निर्भर हैं 25 परिवार

अबुआ आवास, प्रधानमंत्री आवास और विधवा पेंशन जैसी योजनाओं से गांव के लोग वंचित

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