रांची की प्रीति कुमार का नीति आयोग के 'ग्रासरूट्स इनोवेटर रिकग्निशन-2026' में चयन, राष्ट्रपति के हाथों मिलेगा सम्मान

लुगम कोकून प्राइवेट लिमिटेड की निदेशक प्रीति कुमार. फोटो: प्रभात खबर
रांची की प्रीति कुमार को नीति आयोग के अटल इनोवेशन मिशन द्वारा 'ग्रासरूट्स इनोवेटर रिकग्निशन-2026' से सम्मानित किया जाएगा. उन्होंने तसर सिल्क के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाया है.
रांची से लता रानी की रिपोर्ट
NITI Aayog AIM Award: रांची के बरियातू की रहने वाली और लुगम कोकून प्राइवेट लिमिटेड की निदेशक सह मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी (सीइओ) प्रीति कुमार का चयन नीति आयोग के अटल इनोवेशन मिशन (एआईएम) के प्रतिष्ठित 'ग्रासरूट्स इनोवेटर रिकग्निशन-2026' के लिए किया गया है. तसर सिल्क आधारित नवाचारों (इनोवेशंस) के माध्यम से ग्रामीण व जनजातीय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें आजीविका के नए व टिकाऊ अवसर उपलब्ध कराने में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से अलंकृत किया जाएगा. आगामी 31 जुलाई को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले एक विशेष और भव्य समारोह में उन्हें यह राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया जाएगा.
देशभर से केवल 26 नवप्रवर्तकों का हुआ चयन
अटल इनोवेशन मिशन के तहत देश भर से समाज में व्यापक बदलाव लाने वाले मात्र 26 जमीनी नवप्रवर्तकों (ग्रासरूट्स इनोवेटर्स) का चयन इस सम्मान के लिए किया गया है. इस प्रतिष्ठित सूची में पूरे झारखंड राज्य से चयनित होने वाली प्रीति कुमार एकमात्र नवप्रवर्तक हैं. यह सम्मान मुख्य रूप से उन दूरदर्शी इनोवेटर्स को दिया जाता है, जिन्होंने जमीनी स्तर पर समाज की वास्तविक और जटिल समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजते हुए अपने नवाचारों के जरिए लोगों के जीवनस्तर में क्रांतिकारी और सकारात्मक बदलाव लाने का काम किया है. प्रीति कुमार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि न केवल रांची शहर बल्कि पूरे झारखंड प्रदेश के लिए अत्यंत गर्व और प्रेरणा का विषय है.
प्रीति कुमार का सफर
प्रीति कुमार (पति धीरेंद्र कुमार, सेवानिवृत्त आईएफएस) का सामाजिक विकास और जनसेवा से पुराना नाता रहा है. वह पूर्व में झारखंड शिक्षा विभाग में परियोजना अधिकारी (प्रोजेक्ट ऑफिसर) के रूप में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. अपने प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान उन्होंने बालिका शिक्षा, जनजातीय समुदायों के उत्थान और विशेष रूप से विलुप्तप्राय बिरहोर जनजाति के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के लिए लंबे समय तक धरातल पर काम किया है.
तसर धागा उत्पादन बढ़ाने पर कर रही हैं काम
वर्तमान में वे तसर उद्योग के जरिए ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के मिशन पर पूरी निष्ठा से जुटी हुई हैं. उनकी कंपनी 'लुगम कोकून प्राइवेट लिमिटेड' रामगढ़ जिले के सिकनी गांव तथा हजारीबाग जिले के चरही प्रखंड स्थित कजरी गांव में महिलाओं के साथ मिलकर तसर धागा उत्पादन और वस्त्र निर्माण का कार्य बड़े पैमाने पर कर रही है. इस कंपनी की सबसे खास बात यह है कि इसमें लगभग 99 प्रतिशत कार्यबल महिलाओं का ही है और महिला सशक्तीकरण ही इसका मूल उद्देश्य है.
स्वदेशी तकनीक से चीनी आयात को दी सीधी चुनौती
भारतीय वस्त्र उद्योग में तसर कपड़ों की बुनाई के दौरान ताना (वार्ट) तैयार करने के लिए पारंपरिक रूप से चीन से आयातित रेशमी धागे का ही उपयोग किया जाता रहा है. प्रीति कुमार ने इस विदेशी निर्भरता को समाप्त करने का संकल्प लिया और पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक विकसित करके उच्च गुणवत्ता वाले तसर धागे का निर्माण शुरू किया.
गांव की महिलाएं बनाती हैं तसर का धागा
उनकी कंपनी में स्थानीय ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए गए तसर धागे से ही ताना बनाया जाता है, जो मजबूती और फिनिशिंग के मामले में चीन से आने वाले महंगे धागे से काफी बेहतर सिद्ध हुआ है. आज उनकी कंपनी द्वारा तैयार तसर धागों और निर्मित परिधानों की आपूर्ति ट्राइब्स इंडिया, विभिन्न एक्सपोर्ट हाउस, झारखंड सरकार के कुसुम एम्पोरियम सहित अमेजन, ओएनडीसी, इंडिया हैंडमेड और फ्लिपकार्ट जैसे प्रमुख ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पूरे देश में की जा रही है.
वेस्ट टू वेल्थ: तसर उद्योग में वेस्ट मैनेजमेंट में नवाचार
प्रीति कुमार का नवाचार केवल धागा बनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने तसर उद्योग से निकलने वाले कचरे (वेस्ट) के कुशल प्रबंधन को भी एक नए बिजनेस मॉडल से जोड़ा है. पहले तसर कोकून (कोया) को उबालने की प्रक्रिया के बाद बचा हुआ पानी पूरी तरह बेकार समझकर बहा दिया जाता था. प्रीति कुमार ने शोध करके उस बचे हुए पानी से 'सेरिसिन' प्रोटीन निकालने की तकनीक अपनाई. इस सेरिसिन का उपयोग आज कॉस्मेटिक और फार्मास्युटिकल (औषधि) उद्योग में प्रीमियम कच्चे माल के रूप में किया जा रहा है.
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मछली के चार के लिए होता है मृत प्यूपा का इस्तेमाल
इसके अलावा, प्रक्रिया के दौरान निकलने वाले मृत प्यूपा का इस्तेमाल उच्च गुणवत्ता वाले फिश फीड (मछली के चारे) के निर्माण में किया जा रहा है. इस 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल से एक तरफ जहां पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय के नए स्रोत भी पैदा हुए हैं. उनका यह मॉडल पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण बन चुका है.
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लेखक के बारे में
By कुमार विश्वत सेन
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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