झारखंड हाईकोर्ट में भुइहर समुदाय ने दायर की जनहित याचिका, नाम सुधार की मांग

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झारखंड हाईकोर्ट की फाइल फोटो.

झारखंड हाईकोर्ट की फाइल फोटो.

झारखंड हाईकोर्ट में भुइहर समुदाय की ओर से एक जनहित याचिका दायर की गई है. इसमें अनुसंधान रिपोर्ट में समुदाय के नाम की एक लिपिकीय त्रुटि को सुधारने की मांग की गई है, जिससे भविष्य में हजारों लोगों को एसटी प्रमाण पत्र प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है. अदालत से इस तकनीकी गलती को दूर करने का अनुरोध किया गया है.

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रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट में 'भुइहर ट्राइब राइट्स होल्डर्स कमेटी' की ओर से एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है. याचिका में राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार के संबंधित अधिकारियों पर पिछले छह वर्षों से चल रही अनुसंधान प्रक्रिया में हुई एक गंभीर प्रशासनिक एवं लिपिकीय त्रुटि को समय रहते ठीक नहीं करने का आरोप लगाया गया है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि इस त्रुटि को तत्काल नहीं सुधारा गया तो भविष्य में भुइहर समुदाय के हजारों लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में गंभीर कानूनी और प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है.

केवल नाम सुधार की मांग

भुइहर ट्राइब राइट्स होल्डर्स कमेटी की ओर से यह जनहित याचिका अधिवक्ता अच्युत स्वरुप मिश्र के माध्यम से दाखिल की गई है. याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य किसी नई जनजाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल कराने का निर्देश प्राप्त करना नहीं है, बल्कि केवल अनुसंधान रिपोर्ट और उससे जुड़े सरकारी दस्तावेजों में समुदाय का नाम आधिकारिक भूमि अभिलेखों के अनुरूप दर्ज कराने की मांग करना है.

डॉ रामदयाल मुंडा टीआरआई ने की थी अनुशंसा

याचिका के अनुसार, झारखंड सरकार ने वर्ष 2020 में भुइहर समुदाय को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की प्रक्रिया के तहत विस्तृत सामाजिक, सांस्कृतिक और नृवंशीय अध्ययन प्रारंभ कराया था. इस अध्ययन का दायित्व डॉ. रामदयाल मुंडा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) को सौंपा गया था. संस्थान ने व्यापक शोध और सर्वेक्षण के बाद समुदाय की सामाजिक एवं ऐतिहासिक स्थिति का मूल्यांकन किया और अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल किए जाने की अनुशंसा की.

अनुसंधान रिपोर्ट और केंद्र से पत्राचार का घटनाक्रम

याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2021 में झारखंड सरकार ने अपनी अनुशंसा भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय को भेज दी थी. इसके बाद वर्ष 2023 में भारत के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआई) ने कुछ अतिरिक्त स्पष्टीकरण और तथ्य उपलब्ध कराने का अनुरोध किया. इस पर TRI ने पुनः विस्तृत अध्ययन किया और 11 दिसंबर 2024 को अंतिम पुनः अनुसंधान रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी.

खतियान और रिपोर्ट के नाम में अंतर

विवाद की जड़ इसी अंतिम अनुसंधान रिपोर्ट के शीर्षक में बताई गई त्रुटि है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि रिपोर्ट में समुदाय का नाम "भूईंहर मुंडा/भुईंहर" अंकित किया गया है, जबकि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट), 1908 के तहत तैयार मूल खतियानों तथा राजस्व अभिलेखों में समुदाय का आधिकारिक नाम केवल "भुइहर" दर्ज है. उनका कहना है कि यह एक साधारण लिपिकीय गलती है, लेकिन इसके दूरगामी कानूनी परिणाम हो सकते हैं.

एसटी प्रमाण-पत्र और अधिकारों पर पड़ सकता है असर

याचिका में कहा गया है कि यदि केंद्र सरकार इसी त्रुटिपूर्ण नाम के आधार पर भविष्य में अनुसूचित जनजाति की अधिसूचना जारी करती है, तो समुदाय के लोगों के भूमि अभिलेखों और सरकारी अधिसूचना में दर्ज नाम अलग-अलग हो जाएंगे. ऐसी स्थिति में हजारों लोगों को एसटी प्रमाण-पत्र बनवाने, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने तथा आरक्षण संबंधी अधिकारों के उपयोग के दौरान गंभीर प्रशासनिक और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है.

अधिवक्ता अच्युत स्वरूप मिश्र का पक्ष

अधिवक्ता अच्युत स्वरूप मिश्र का कहना है कि यह केवल एक तकनीकी और लिपिकीय त्रुटि है, जिसे समय रहते सुधारा जाना आवश्यक है. उन्होंने कहा कि न्यायालय से केवल इतना अनुरोध किया गया है कि टीआरआई की अंतिम अनुसंधान रिपोर्ट, उसके शीर्षक तथा संबंधित सभी सरकारी पत्राचार में समुदाय का नाम आधिकारिक भूमि अभिलेखों के अनुरूप "भुइहर" दर्ज करने का निर्देश दिया जाए.

संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और अदालत से गुहार

जनहित याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा इस स्पष्ट त्रुटि को दूर नहीं करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4), 16(4), 21 और 46 के तहत समुदाय को प्राप्त समानता, सामाजिक न्याय, संरक्षण तथा गरिमापूर्ण जीवन के अधिकारों का उल्लंघन है. याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया है कि राज्य सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह टीआरआई की अंतिम रिपोर्ट और संबंधित सभी सरकारी दस्तावेजों में आवश्यक संशोधन कर निर्धारित समय सीमा के भीतर संशोधित अनुशंसा भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया को भेजे.

प्रशासनिक अव्यवस्था बढ़ने की आशंका

याचिका में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि यदि यह त्रुटि अभी नहीं सुधारी गई, तो पिछले छह वर्षों से चली आ रही पूरी अनुसंधान प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. साथ ही भविष्य में समुदाय के हजारों लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अलग-अलग मुकदमे दायर करने पड़ सकते हैं, जिससे प्रशासनिक अव्यवस्था बढ़ेगी और न्यायालयों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

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हाईकोर्ट के फैसले पर टिकीं नजरें

फिलहाल यह मामला झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है. अब अदालत के निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हैं कि वह इस कथित प्रशासनिक एवं लिपिकीय त्रुटि के संबंध में क्या निर्देश जारी करती है और भुइहर समुदाय के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं.

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कुमार विश्वत सेन

लेखक के बारे में

By कुमार विश्वत सेन

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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