केरल से दर्द भरी यादें लेकर लौटीं झारखंड की बेटियां

Updated at : 06 Jun 2020 11:41 PM (IST)
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केरल से दर्द भरी यादें लेकर लौटीं झारखंड की बेटियां

अब नहीं जायेंगे रोजी-रोटी के चक्कर में केरल. जिल्लत से भरी जिंदगी से निजात मिली है. झारखंड में रह कर ही कुछ काम करेंगे. लॉकडाउन में एक-एक दिन घुट-घुट कर गुजर रहा था. उक्त बातें केरल के एर्नाकुलम से लौटी झारखंड की बेटियों ने कही. अपनी धरती पर आकर खुश दिखीं. उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार ने अच्छी पहल की. हमें अपनों से मिलाया. शनिवार को दिन के 11 बजे झारखंड के विभिन्न जिलों की करीब 500 लड़कियां रांची लौटीं.

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रांची : अब नहीं जायेंगे रोजी-रोटी के चक्कर में केरल. जिल्लत से भरी जिंदगी से निजात मिली है. झारखंड में रह कर ही कुछ काम करेंगे. लॉकडाउन में एक-एक दिन घुट-घुट कर गुजर रहा था. उक्त बातें केरल के एर्नाकुलम से लौटी झारखंड की बेटियों ने कही. अपनी धरती पर आकर खुश दिखीं. उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार ने अच्छी पहल की. हमें अपनों से मिलाया. शनिवार को दिन के 11 बजे झारखंड के विभिन्न जिलों की करीब 500 लड़कियां रांची लौटीं.

हटिया स्टेशन पर थर्मल स्क्रीनिंग के बाद जब वे बाहर निकलीं, तो अपना दर्द बयां किया. उन्होंने कहा कि केरल से झारखंड आने के लिए जुल्म सहे और 20 किमी पैदल चलने के बाद स्टेशन पहुंचीं. उन्होंने झारखंड सरकार के प्रति आभार जताया. दाने-दाने को हो गयी थीं मोहताज लड़कियों ने कहा कि दो माह के लॉकडाउन के दौरान दाने-दाने को मोहताज हो गयी थीं. जब विरोध किया, तो हॉस्टल से निकाल दिया गया. गुमला निवासी करिश्मा ने बताया कि वह केरल में सिलाई करती थी.

प्रति माह 8000 रुपये देने की बात हुई थी, लेकिन तीन माह में मात्र 4000 रुपये ही दिये गये. घर जाने की बात कहने पर उन्हें एक वक्त का ही खाना दिया जाता था. जब उन्होंने विरोध किया, तो हाथ पकड़ कर निकाल दिया गया. हजारीबाग की आशा देवी ने कहा कि केरल में सभी लड़कियों को कैदी की तरह रखा जाता था.

विरोधस्वरूप जब लड़कियों ने अपना पंचिंग कार्ड और अालमारी की चाबी दे दी, तो खाना बंद कर दिया गया. रेलवे स्टेशन जाने के लिए वाहन भी नहीं मिला. सभी 20 किमी पैदल चलकर स्टेशन पहुंचे. तीन माह में 24 हजार की जगह मात्र छह हजार रुपये ही दिये गये. वहीं, बोकारो निवासी पिंकी कुमारी ने कहा कि वह भी सिलाई का काम करती थी.

उसे भी प्रति माह 8000 रुपये देने की बात कही गयी थी, लेकिन लाॅकडाउन के तीन माह में मात्र तीन हजार रुपये दिये गये. पिंकी ने कहा कि लॉकडाउन में नियमित खाना नहीं मिलता था. साथ ही जबरन काम करने को कहा जाता था. विरोध करने पर भूखा रखा गया. एक जून को वहां से निकाल दिया गया.

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