Ranchi News : जीवनदायिनी हैं झारखंड के औषधीय पौधे

Published by :MUNNA KUMAR SINGH
Published at :29 Jun 2025 12:53 AM (IST)
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Ranchi News : जीवनदायिनी हैं झारखंड के औषधीय पौधे

झारखंड न केवल खनिज संसाधनों में समृद्ध है, बल्कि जैव विविधता और औषधीय पौधों के मामले में भी यह राज्य देश में अग्रणी स्थान रखता है.

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रांची (मनोज सिंह). झारखंड न केवल खनिज संसाधनों में समृद्ध है, बल्कि जैव विविधता और औषधीय पौधों के मामले में भी यह राज्य देश में अग्रणी स्थान रखता है. यहां की वनस्पति संपदा में अनेक ऐसी औषधीय प्रजातियां मौजूद हैं, जो परंपरागत ज्ञान और चिकित्सा पद्धति में वर्षों से उपयोग में लायी जाती रही हैं. अब इन्हें वैज्ञानिक आधार और दस्तावेजी स्वरूप देने की दिशा में सार्थक प्रयास हो रहे हैं. झारखंड जैव विविधता बोर्ड ने राज्य के करीब 150 औषधीय पौधों को सूचीबद्ध किया है. इन पौधों के औषधीय गुण, प्रयोग विधि और उनकी उपयोगिता को विशेषज्ञों की मदद से संकलित किया गया है. इस महत्त्वपूर्ण कार्य का नेतृत्व भारतीय वन सेवा की वरिष्ठ अधिकारी और बोर्ड की अध्यक्ष शैलजा सिंह कर रही हैं. श्रीमती सिंह के अनुसार राज्य के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक स्वरूप देना हमारा उद्देश्य है ताकि जनजातीय समुदायों सहित आमजन भी इन औषधीय पौधों का सुरक्षित और प्रभावी उपयोग कर सकें.

कुछ प्रमुख औषधीय पौधों की जानकारी :

लता कस्तुरी : भिंडी के समान स्वरूप वाला यह पौधा झारखंड के कई हिस्सों में पाया जाता है. इसके बीजों से निकलने वाला तेल हृदय रोग और नेत्र विकारों में लाभकारी है. इसके बीज में कस्तुरी की गंध होती है. झारखंड के कई हिस्सों में पाया जाता है.

गुण : बीज का तेल ह्रदय रोगियों के लिए फायदेमंद है. नेत्र रोग में भी लाभकारी है. इसके पौधों को सुखाकर धुंआ लेने से गले की सूजन मिटती है और आवाज भी साफ होती है.

मात्रा : लता कस्तुरी के बीज के चूर्ण को एक ग्राम तक दो बार लिया जाता है.

बाकस (अडूसा) : चार से आठ फीट ऊंचा यह पौधा कफ निस्सारक है, जो फेफड़ों को स्वच्छ करता है और बुखार, पेट की गड़बड़ी और मासिक धर्म संबंधी विकारों में उपयोगी है. पत्ते लंबे और अमरुद के पत्तों के सामान होते हैं. इसका फूल सफेद और लकड़ी मुलायम होती है. इसका काढ़ा अत्यंत प्रभावी माना गया है.

गुण : यह पेट की गड़बड़ी, बुखार, सूजन में भी उपयोगी है. इसका काढ़ा कफ को पतला कर निकाल देता है. फेफड़ों की गंदगी को साफ करता है. खून को भी शुद्ध करता है. मासिक धर्म को नियमित करता है.

मात्रा : 10 से 20 ग्राम पौधा, फूल, पत्ता जो भी हो, उसे 250 ग्राम पानी में उबाला जाता है. पानी जब आधा हो जाये तो उपयोग किया जाता है.

मानकंद : बड़े गोल पत्तों और कंद वाले इस पौधे की सब्जी स्वादिष्ट होती है. इसकी खेती भी होती है. स्वत: भी बाग-बगीचों में उग आता है. इसका तना मोटा और जड़ में कंद होता है. पत्ते बहुत बड़े और गोलाकार होते हैं. इसके पत्ते की सब्जी भी बनती है.

गुण : यह सूजन को दूर करने वाला शीतल, रक्तपीत नाशक और स्वादिष्ट होता है. ज्यादा नमक खाने से होने वाले रोगों को दूर करता है. इसकी सब्जी कब्ज मिटाती है. बवासीर में लाभदायक होता है.

मात्रा : कंदे को सुखाकर चूर्ण बनाकर चावल के आटे के साथ मिलाकर उबालकर, छानकर 100 से 200 ग्राम काढ़ा के रूप में उपयोग करने से सूजन मिटता है.

घृतकुमारी (एलोवेरा) : यह पौधा पाचन तंत्र, त्वचा, यकृत और आंखों के रोगों में उपयोगी है. पत्तों में दोनों तरफ कांटे होते हैं. इसके पत्तों को छिलने से भीतर उजला, लुआवदार गुद्दा निकलता है.

गुण : यह मधुर, ठंडा, दस्तावर, मज्जावर्द्धक, विष निवारक व कृमिनाशक होता है. आंखों के रोग, यकृत, श्वास, कुष्ठ, पीलिया, पथरी और घाव में लाभदायक होता है. आंतों में जमा हुआ मल बाहर निकल जाता है. पित्त का जमाव घुल जाता है. इससे पीलिया रोग ठीक हो जाता है. रस का सेवन पीलिया, कब्ज और पेट के विकारों में लाभ पहुंचाता है.

मात्रा : धृतकुमारी को दो बूंद रस, आंखों की लाली, सूजन, दर्द पर पर भी अच्छा फायदा पहुंचाता है.

कटेली चौलाई : यह प्रसिद्ध चौलाई की साग की प्रजाति का एक पौधा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें कांटा होता है, साग वाली प्रजाति में कांटा नहीं होता है. इसके ठंठल लाल और उजला दोनों प्रकार के होते हैं. इसके पत्ते चौड़े, लंबे, गोल और लंबे डंठल वाले होते हैं. इसका फूल पीलापन लिए हुए होता है.

गुण : यह शीतल गुणकारी पौधा है. यह गर्भाशय के लिए ताकतवर और समस्त अंगों से जहर को निकालने वाली दवा मानी जाती है. इसके साग खाने से पथरी खत्म हो जाते हैं. इसके पत्तों को पानी के साथ पीसकर लेप लगाने से मकड़ी का घाल मिटता है. शहद के साथ खाने से रक्तपीत मिटता है.

मात्रा : पत्ते और नीम के पत्ते को पीसकर कनपटी पर लेप लगाने से नाक से गिरने वाला खून बंद हो जाता है.

कदम्ब : इसका फल खाद्य रूप में और छाल औषधीय रूप में प्रयोग होती है. छाल का काढ़ा बुखार में प्रभावी है, जबकि फल का चूर्ण वायुविकारों से ग्रस्त लोगों को नहीं दिया जाना चाहिए. चटनी और आचार के रूप में भी खाया जाता है. पका फल भोजन के रूप में व्यवहार किया जाता है.

गुण : इसके छाल का प्रयोग बुखार में लाभदायक है. इसके छाल के चूर्ण को तीन से पांच ग्राम सूखा कर उपयोग किया जा सकता है.

मात्रा : कदम्ब के फल का सूखा चूर्ण दो से तीन ग्राम तक दिया जा सकता है. गुलर : यह बहुउपयोगी वृक्ष है, जिसके फल, पत्ते, छाल और काढ़ा शरीर को बल प्रदान करते हैं. पित्त दोष, अल्सर और नेत्र रोगों में अत्यंत प्रभावी है. इसका उपयोग शरीर के अंग-प्रत्यंगों को पुष्ट करने व क्षय से बचने के लिए किया जाता है. इसके फल का उपयोग वनवासी भोजन के रूप में भी करते हैं. फल की सब्जी पेट के लिए लाभदायक है. इसके काढ़ा को ठंडा कर आंख धोने से कई प्रकार के रोग ठीक होते हैं.

गुण : पित्त दोष को दूर कर यह शरीर के रंग को निखारता है. चमकदार और गठीला बनाता है. यह अलसर को भी मिटाता है.

मात्रा : गुलर के फल को सूखाकर दो से पांच ग्राम चूर्ण के रूप में उपयोग किया जाता है.

बड़ (बरगद) : प्राचीन चिकित्सा परंपरा में पूजनीय यह वृक्ष मधुमेह, खांसी, कब्ज और रक्त शुद्धिकरण में उपयोगी है. इसके जटा का दातुन और दूध का सेवन लाभकारी होता है. यह पुरानी खांसी को ठीक करता है. रक्त को शुद्ध कर रक्त रोगों को मिटाता है. इसके जटा का दातुन दांत के लिए उपयोगी होता है.

गुण : मधुमेह में इसके छाल का काढ़ा रक्त और मूत्र शर्करा को मिटाता है. मधुमेह के कारण होने वाली किडनी, ह्रदय आदि बीमारियों से दूर रखता है. दूध को बतासा या चीनी के साथ सेवन करने से कब्ज जैसी बीमारियों में फायदा होता है.

मात्रा : दूध की मात्रा 10 से 20 बूंद तक ही उपयोग करना होता है. काढ़े के लिए कोमल पत्ते का चूर्ण एक से दो ग्राम उपयोग करना चाहिए. गिलोय : यह आयुर्वेद की प्रसिद्ध औषधि है. यह अब घर-घर में पायी जाती है. झारखंड में यह प्राकृतिक रूप से उपजता है. इसकी लता बहुत बड़ी और बहुत वर्षों तक जीवित रहने वाला होता है. इसके पत्ते पान के पत्तों के सामान होता है. फूल बारीक पीले रंग का झुमको की तरह खिलता है. फल लाल रंग के होते हैं.

गुण : इसका काढ़ा मूत्र दोष में लाभदायक होता है. यह विषनाशक होता है. सर्प विष पर इसके जड़ का रस आधे-आधे घंटे में पिलाया जाता है. कटे हुए स्थान पर भी लगाया जाता है. इसका प्रयोग गठिया, आम वात में भी किया जाता है. पुराने ज्वर खांसी में इसके काढ़े का ताजा रस शहर और पीपल में मिलाकर देने से लाभ होता है.

मात्रा : ताजा गिलोय 10 से 20 ग्राम तक पीसकर छानकर पिलाया जा सकता है. इसका काढ़ा भी बनाकर उपयोग किया जा सकता है. यदि सुखाकर चूर्ण बनाना हो तो पांच ग्राम तक दिया जा सकता है.

भूमि आंवला : यह पूरे राज्य में पाया जाता है. इसका पौधा छह इंच से लेकर दो से तीन फीट तक होता है. यह आंवला से मिलता जुलता है. आंवले की तरह यह बड़ा पेड़ नहीं होता है. यह झारखंड के मैदानी भाग में ज्यादा पाया जाता है.

गुण : यह सभी अंगों-प्रत्यंगों को मजबूती देता है. घाव भरने का काम करता है. पुरानी पेचिस की बीमारी को दूर करता है. पाचन के प्रत्येक अंग-प्रत्यंगों को नवीनता प्रदान करता है. इसके जड़ को पीसकर पिलाने से पीलिया में राहत मिलता है.

मात्रा : दो तीन ग्राम दो बार दिन में उपयोग किया जा सकता है. पौधे को पीसकर शर्बत के रूप में प्रतिदिन उपयोग करने से पीलिया दूर हो सकता है. चिरौंजी : झारखंड के कई हिस्सों में यह पेड़ बहुतायात में पाया जाता है. मुख्य रूप से कोल्हान वाले हिस्से में ज्यादा है. पित रोग में इसके उपयोग करने से दवा और आहार का काम भी करता है. जलन मिटाता है. कफ दूर करता है. कब्ज का स्थायी इलाज भी है.

गुण : अनिद्रा, बेचैनी, जलन और सुस्ती मिटाता है. इसे बुखार की हालात में दिया सकता है. यह वीर्य वर्द्धक और पौष्टिक है. इसको प्रतिदिन 10 ग्राम तक उपयोग किया जा सकता है.

आदिवासी ज्ञान को वैज्ञानिक आधार

इस पहल का उद्देश्य न केवल औषधीय पौधों का संरक्षण और संवर्धन है, बल्कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक चिकित्सा के साथ जोड़कर व्यापक जनहित में प्रस्तुत करना भी है. जैव विविधता बोर्ड का यह प्रयास राज्य को आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में नयी पहचान दिला सकता है. झारखंड औषधीय पौधों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है. परंपरागत जानकारी को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ जोड़कर हम जनहित में एक सशक्त स्रोत विकसित कर रहे हैं.

शैलजा सिंह, अध्यक्ष, झारखंड बायोडायवर्सिटी बोर्ड

विशेष सलाह : इन पौधों का उपयोग करते समय मात्रा, रोग की प्रकृति और व्यक्तिगत शरीर के अनुसार अनुकूलता का ध्यान रखना आवश्यक है. कुछ पौधे (जैसे सर्पगंधा, धतूरा) चिकित्सकीय निगरानी में ही उपयोग करें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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